15.1 C
Delhi
Wednesday, November 30, 2022

OPINION: मैंने हिंदू धर्म क्यों त्यागा…

हमारे देश के हालात बदलते जा रहे हैं, दुनिया विज्ञान और तकनीकी की बात कर रही है। सोच रही है की अगर जमीन पर भूकंप आ जाए तो दूसरी जगह ऐसी कौन सी सुरक्षित रहेगी, जहां पर मानव समाज जाकर आसानी से आपनी जिंदगी बिता सके। दुनिया एक तरफ चांद पर जाकर रहने का विचार कर रही है और दूसरी तरफ हमारा देश जात-पात, पंथ-धर्म, ऊंच-नीच, गरीब-अमीर, तेरा-मेरा के बीच में फंसा है। हर कोई अपने स्वार्थ में जी रहा है। कोई भी टीवी चैनल लगाओ बात आएगी धर्म खतरे में है, हिन्दू खतरे में है। मंदिर प्रवेश के कारण दलित बस्ती जला दी गई है। दलित महिला का नग्न अवस्था में जुलूस निकाला गया, बलात्कार किया गया, घोड़ी पर चढ़ना, मूंछ बढ़ाने पर मार खाना, मटका छूने पर जान से मार देना। ऐसी घटनाएं हम हर घड़ी हर वक्त देख रहे हैं। ये सब देख सुन कर मन खिन्न हो रहा है। सवाल खड़ा हो रहा है, क्या दलित हिन्दू नहीं हैं?

महाराष्ट्र में रहने वाले दलितों में प्रमुख जाति देखी जाए तो महार, मांग, मातंग और चांभार है। यह तीनों जातियां हिन्दू धर्म से आती हैं। इनमें से महार जाति के लोगों ने 1956 में बाबसाहब आंबेडकर के साथ हिन्दू धर्म छोड़ बुद्ध धर्म अपनाया, तब महार समाज के साथ कुछ मांग, चांभार लोगों ने भी धर्म परिवर्तन किया था। हालांकि अभी भी कुछ महार समाज के लोग अपने को हिंदू मानते है।

बताना चाहूंगा कि मैं महाराष्ट्र की दलित मांग जाति से हूं। गरीब परिवार है हमारा। देश और महाराष्ट्र के इतिहास में मांग जाति का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है पर आज इस समाज के हालात ठीक नहीं है। समाज में गरीबी, जाति व्यवस्था की मार व घोर अशिक्षा के कारण इस तबके के लोग आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़ गए हैं।

हमारे समाज की एक बस्ती है, जिसका नाम कान्सुर बस्ती है। यहां मेरा जन्म 1999 के मार्च महीने में हुआ था। मेरे परिवार में माता-पिता व दो बहनें हैं। हम बड़े हो रहे थे, स्कूल में जाने लगे। जैसे-जैसे समझ रहा था। वैसे ही हमारे गाँव में आंबेडकर व अण्णाभाऊ साठे की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी। समझ में आ रहा था की आंबेडकर महार हैं, अण्णाभाऊ साठे मांग हैं तो हमारे हैं यह सब बातें बचपन से देखता सुनता था।

मेरे अंकल बैंड बजाने का काम करते थे, एक नजदीक के गांव में शादी में बैंड बजाने मुझे लेकर गए, तब मेरी उम्र 12 से 13 साल की होगी। गाँव के हिन्दू मराठा परिवार में बेटी की शादी थी। कार्यक्रमपूरा हो जाता है। लोग खाना खाते हैं। मुझे प्यास लगती है। पानी पीने के लिए एक बॉटल रखा होता है। मैं बॉटल से पानी लेने का प्रयास करता हूं तो एक बूढ़ा आदमी आता है। देखता है और बोलता है कि “तू बैंड बजाने आया है तो वही कर, हमारा पानी अपवित्र करेगा तो हम क्या पीएंगे?”

मुझे यह बात समझ ही नहीं आती। बचपना था। मैं इस बात को हलके में लेता हूं। वहां से चला जाता हूं। बचपन में जब हम हनुमान मंदिर में हनुमान को नारियल चढ़ाने जाते थे तब हमारे परिजन कहते थे। वहां जाना मना है। मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने पर हमारे पुरखों को मारा जाता था। परिजनों ने बताया कि नारियल फोड़ने के लिए जावो तो मंदिर की पहली सीढ़ी के नीचे ही नारियल फोड़ना है। जब घर वालों से पूछता कि हम भी तो इन्सान हैं। हमें भी तो अधिकार है। घर वालों का जवाब आता था कि “हम मांसाहारी है, इसलिए मंदिर के भगवान को अपवित्र नहीं कर सकते।” मन व्यथित हो जाता था। ये सब बातें सुनकर पर अफसोस इस बात का है कि उस वक्त इतनी भी समझदारी नहीं थी ये क्या हो रहा है।

हमारे घर में शुरू से ही पूजा-पाठ, दीपावली, गणपति व दशहरा त्योहार बडे़ धूमधाम से मनाया जाता है। मेरी मां धनलक्ष्मी के व्रत रखती थी। पापा पढ़े-लिखे होने के कारण इन सब पर विश्वास नहीं करते थे पर वे मां का विरोध नहीं करते थे। पापा की शिक्षा 11वीं तक हो गई थी। वे गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे। वैसे शिक्षा का महत्व पहले से घर में था, लेकिन कुछ दिनों में सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों का जीआर बदल गया। अब सरकारी स्कूल में 12 के आगे पढ़े शिक्षकों की भर्ती होने लगी, जिसके चलते पापा की नौकरी चली गई। इस कारण से शिक्षा का महत्व घर में बढ़ता गया। जब मैं आठवीं कक्षा में गया तो मुझे गांव से दूर मानवत तालुका स्थित स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया।

मैं बचपन से पढ़ाई में अच्छा था। मुझे मानवत के सरकारी छात्रावास में प्रवेश मिल गया था। मैं तब थोड़ा समझ रहा था हिन्दू क्या होता है? मुसलमान कौन होते हैं? वहां की सुबह जय भीम से शुरू होती थी और शाम भी जय भीम पर ही खतम होती थी। मेरे लिए यह सब नया था। मुझे मालूम था की हमारी मांग कम्युनिटी में जब लोग आपस में मिलते हैं तब वे आदरपूर्वक राम राम कहते हैं, लेकिन युवा जय लहुजी का नारा बुलंद करते थे। लहुजी साळवे मांग समाज के महामानव, क्रांतिवीर थे। समाज में एक नया उत्साह व समाज की चेतना जगाने के लिए जब युवा मिलते थे तब राम राम से उन्हे अपना जय लहूजी अभिवादन क्रांतिकारी लगता था। अब हॉस्टल में डिबेट होने लगी थी कि मांग समाज के लोगों के लिए बाबासाहब ने इतना कुछ किया तब भी यह कम्युनिटी सुधर नहीं पाई। कुछ तो ऐसा भी बोलने लगे थे की खाते हैं बाबासाहब का और नाम लेते हैं राम का। यह सब बातें सुन रहा था अन्दर ही अंदर सवाल कर रहा था। पर दिमाग पर हिंदू धर्म की पगड़ी होने के कारण सोचने के अलावा कुछ कर नहीं पाया।

दसवीं का रिजल्ट आता है। अब 11वीं कक्षा में प्रवेश लेने के लिए घर में खलबली शुरू होती है कि एडमिशन कहा पर लिया जाए। हमारे मामा संजय कासबे जो बामसेफ में काम करते हैं। वे चाय पीने के लिए घर पर आते हैं तो पापा से बातचीत चलती है। मुझसे पूछते हैं कि तुझे भविष्य में क्या करना है? मेरे पास सवाल का जवाब नहीं होता है। चुपचाप बैठ जाता हूं। मामा बोलते हैं कि अजय का एडमिशन डॉक्टर बाबासाहब आंबेडकर स्थापित मिलिंद महाविद्यालय में किया जाए ताकि भविष्य में कुछ कर ना पाए तो अच्छा इंसान तो बनेगा। वे मुझे बताते हैं कि मिलिंद महाविद्यालय की दीवारों पर कई सारे संदेश कई सारे विचार लिखे हैं। उसे तुम पढ़ना।

मैं ऐसा मानता हूं कि यह मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। क्योंकि मैं बाबासाहब को जानता नहीं था ना ही मानता था। मिलिंद महाविद्यालय में जब एडमिशन हुआ। तब बाबा साहब के बारे में पढ़ने लगा। महाविद्यालय की हर वो दीवार जिसपर लिखा होता है शिक्षित बनो, संघटित बनो, संघर्ष करो। हर दीवार बाबासाहब के फोटो से सजी हुई है। हर कोई तस्वीर किस साल की है उसे देखकर पता चलता है। मैंने 11वीं में जितने पोस्टर लगे थे, दीवार पर सब पढे़ और हर एक कार्यक्रम अटेंड करना शुरू किया।

पैंथर सेना, रिपब्लिकन सेना, रीपाई (।) भारिप, दलित पैंथर, सत्यशोधक समाज महासंघ इन कई संघटन के कार्यक्रम में जाना शुरू किया। मैं समझ रहा था कि डॉ. बाबासाहब ने कितने हाल संकट झेलकर हमारे समाज के लिए काम किया। कितने दुखों का सामना करना पड़ा, लेकिन अकेले बाबासाहेब ना रुके न थके। एक अच्छे समानता पर आधारित समाज को स्थापित करने का कारवां चलाते गए। अंत में वे बुद्ध की छाया में चले गए। यह सब करते हुए बाबासाहब को अपने चार बच्चे खोने पड़े।

मैं जिस समाज से हूं। बाबासाहब उसी समाज के विकास के लिए 13 मांग महार वतंदार सभाएं लेते। इसका एक मात्र कारण था मांग महार के अपसी झगड़े मिट जाएं। बाबासाहब को पता था अगर महाराष्ट्र में महार कम्युनिटी के आलावा और कोई लड़ सकता है तो वो मांग कम्युनिटी है। अगर यह दोनों समाज एक साथ आते हैं तो बहुत बड़ा सामाजिक बदलाव हो सकता है। इसलिए बाबासाहब अखिर तक प्रयास करते रहे, लेकिन मांग समाज में शिक्षा का प्रमाण कम होना और हिन्दू धर्म का दिमाग पर पगडा होने के कारण मेरा समाज पहले से ही हिंदुत्ववादी संघटनों के करीब जाता गया। तबसे अब तक भारी संख्या में समाज हिंदुत्व में ही फंसा है।

एक दिन औरंगाबाद में कबीर कला मंच कार्यक्रम का आयोजन रिपब्लिकन पैंथर्स जाति निर्मूलन आंदोलन की ओर से किया जाता है। मैं उस कार्यक्रम को जाता हूं। अण्णाभाऊ साठे लिखित गाने से कार्यक्रम शुरू होता है। मुझे कार्यक्रम में अपना दुःख मेरी पीड़ा। मेरा समाज मेरी अस्था मेरा सब कूछ दिखता है। कार्यक्रम के अंत में भीमा सोडूनिया “घरा भरकटल बाळ हाक दे रे जरा सागर गोरखे” गाना पेश करते है तो सारा ऑडिटोरियम रोने लगता हैं। मैं भी रो पड़ता हूं। खुद को शर्म आने लगती है। गुस्सा आता है कि आज तक मैं मेरी जाति को मेरे धर्म को बड़ा समझता था। मेरे जाति के प्रतीक अण्णाभाऊ साठे को सबसे श्रेष्ठ प्रतीक मानता था। कल तक गर्व से कहो हम हिन्दू है यह नारे लागने का मन करने वाले युवा का इस कार्यक्रम ने मन साफ कर दिया और बाबासाहब नाम का दिया मेरे मन में जल गया, जिसके चलते मैं मेरे जीवन अंधकार से दूर प्रकाश की बस्ती में लाने में मदद हो गई।

मैं अब रोज कॉलेज जाता था, कॉलेज कार्यक्रम अटेंड करता था वो बोलते है ना मराठी में बाबासाहब को समझने में वक्त लगेगा। पर जिस दिन समझोगे। उनका प्यार व सम्मान बढ़ जाएगा। कुछ मेरे साथ भी ऐसा ही हो रहा था।

खैर, पेपर में जब खैरलांजी पढ़ा, तो रोंगटे खडे़ हो रहे थे। रमाबाई आंबेडकर नगर की लाशें जब् भी याद आती है तो खून खौल उठता है। इंसान ही इंसान को इतनी बुरी तरीके से कैसे मार सकता है। इसी सोच में खुद को संभालात हूं। मेरे पढ़ने में मुक्ता सालवे आती है जो उस्ताद लहुजी सालवे की बेटी और क्रांतीसूर्य महात्मा फुले, सावित्री माता फुले की पहली छात्रा थीं। महज चौदह साल की उम्र में मुक्ता ने सैडनेस ऑफ महार-मंगा निबंध लिखा और सनातनों की नींद हराम कर दी। यह निबंध इन समाजों के साथ हुए अन्याय पर टिप्पणी करता है। एक ऐसे समय में जब स्त्री के व्यक्तित्व और अस्तित्व को नकारा गया था, (आज भी उसमें बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है।) ऐसे समय में मुक्ता में लिंग और जाति की सीमाओं का सामना करने का साहस था। उन्होंने अछूतों को गुलाम बनाने की प्रथा, कुछ लोगों के धर्मतंत्र, सामाजिक असमानता, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, हिंदू धर्म में शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। धर्म-संस्कृति, रीति-रिवाजों के कारण होने वाली हिंसा का कड़ा विरोध किया।

वह लिखती हैं, ब्राह्मण हमें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं देते हैं। वे कहते है कि वेदों पर हमारा एकाधिकार है, हम उनका पालन करेंगे। इससे यह स्पष्ट होता है कि हमारे पास धर्म ग्रंथ नहीं है तो क्या हम धर्महीन नहीं हैं? मुसलमान कुरान का पालन करते हैं, अंग्रेज बाइबिल का पालन करते हैं और ब्राह्मण वेदों का पालन करते हैं। क्या इसलिए वे हमसे ज्यादा खुश नहीं हैं? हे प्रभु, हमें भी बताओ कि हमारा धर्म क्या है। हम इसे उसी तरह अनुभव करेंगे। धर्म केवल एक को सब अधिकार दे और बाकी लोगों को मजबूर करे, ऐसे धर्म का पृथ्वी से नाश हो जाना चाहिए और हमें ऐसे धर्म पर बहुत अधिक घमंड करना भी नहीं चाहिए। महिलाओं को जकड़ने वाले धर्म पर सवाल उठाने की हिम्मत करके मुक्ता सभी को सोचने पर मजबूर कर देती है कि असली धर्म क्या हो सकता है। वो आगे कहती है कि जिस पेशवा काल में गुल टेकड़ी के मैदान पर हम मांग-महार जाति के लोगों के सर का बॉल और तलवार की स्टिक बनाते हैं और (हॉकी जैसा) खेल खेलते हैं। क्या ऐसा कोई धर्म हो सकता है। ऐसे कई सवाल मुक्ता खड़े करती हैं और हम जैसे मांग समाज के युवाओं को प्रेरित करती हैं।

धर्म परिवर्तन करने को अण्णाभाऊ साठे जो अंत में कहते है कि बाबासाहब मुझे बता कर गए है की तुझे जग बदलना है विचारों के घाव से। मैं जब नामांतर आंदोलन पढ़ता हूं तो मेरे सामने वो चेहरा आता है जो बाबासाहब के नाम के लिए शहीद होता है। जिसका नाम है शहीद पोचीराम कांबले, पोचीराम को अपर कास्ट घेर लेते हैं। उसे कहते हैं क्यू रे पोच्या क्यूँ महारो के आंदोलन में शामिल हो रहा है तुझे क्या मतलब आंबेडकर के नाम से। वे लोग राम-राम कहने को मजबूर करते हैं। लोग बताते हैं कि पोची राम जय भीम, जय भीम कहते ही शहीद होते हैं। एकनाथ आवाड जो आखिर तक नीला झंडा लेकर संघर्ष करते है। जीएस कांबले यह मेरी प्रेरणा बनते हैं।

लातूर जिले में बोरगांव नाम का गांव है। जहाँ पर अपर कास्ट मराठा बड़ी संख्या में रहते हैं। गांव के शुरुआत में ही हिन्दू दलित मांग समाज की सत्यभामा सूर्यांवंशी नामक बहन का घर है जो आते-जाते उन लोगों के आंखों में चुभता था। एक दिन सवर्ण लोग आते हैं और कहने लगते हैं कि हमें तेरा घर देख कर जाना पड़ता है। यह ठीक नहीं है। हम अपवित्र हो जाते हैं। तू इस जगह से दूसरी जगह रहने को जा हमारे लोगों को दिक्कत होती है। हर रोज यहां से गुजरने पर एक मांग का चेहरा देखना पड़ता है। पूरा दीन अशुभ हो जाता है।

सत्यभामा सूर्यवंशी डटी रहती है। मैं क्यूँ मेरे घर मेरी जगह से दूर जाऊं ऐसा सवाल करती हैं तो कुछ दिनों में ही यह जातिवादी गुंडे सत्यभामा सूर्यवंशी के घर को तारों का शेड लगाते हैं। उसका सामाजिक बहिष्कार करते हैं। जब यह सब होता है तो सत्यभामा ताई पुलिस स्टेशन जाती है। पुलिस मदद करने से मना कर देती है। गांव के सवर्णों को जब यह पता चलता हैं कि एक अकेली औरत हमारा विरोध कर रही है तो सत्यभामा सूर्यवंशी की नग्न अवस्था में गाँव में जुलूश निकाला जाता है। न्याय मांगने सत्यभामा ताई एक बार फिर पुलिस स्टेशन उसी हालात में जाती है। एफआईआर दर्ज करने की मांग करती हैं। तब भी पुलिस समझाकर घर भेजने के मूड में ही होती है, पर सत्यभामा सूर्यवंशी एक ऐसी महिला है, जिनको बाबासाहब का न्याय का आंदोलन मालूम था वो कहती है कि अगर आप लोगों ने मेरी तहरीर नहीं ली तो मैं खुद को जलाऊंगी। पूरे पुलिस स्टेशन को भी जलाकार राख कर दूंगी।

जालना जिले में मातंग मांग समाज का एक युवा सरपंच बनता है और अच्छे कपड़े पहन कर घूमता है तो उसकी हत्या की जाती है। मांग जाति खुद को हिंदू समझती है, लेकिन सही मायने में देखा जाए तो क्या इस देश का हिंदू समाज आज भी उन्हें हिन्दू मानने के लिए तैयार है। मुझे लगता है की नहीं।

ऐसी कुछ घटनाओं से मन व्यथित हुआ और ऐसा लगने लगा की हम हिन्दू होकर भी मंदिर में नहीं जा सकते, हम हिन्दू होकर भी एक ही मटके का पानी नहीं पी सकते। हम हिन्दू होकर भी अन्याय होता है तब कोई हिन्दू साथ नहीं खड़ा होता। हिन्दू ही हमें हर रोज मारते हैं। हिन्दू ही हमारी जान ले लेते हैं तो हम कैसे हिन्दू हैं। यह सवाल मेरे मन में खड़ा हुआ और मैं बुद्ध की ओर कदम बढ़ाता गया। बुद्ध धर्म मुझे इस लिए अच्छा लगने लगा की यहा कोई भगवान नहीं है। यहां कोई ऊंच-नीच नहीं है। यहां किसी जाति के नाम से मारे जाने का डर नहीं है। क्योंकि बुद्ध धर्म में ना जाति है न वर्ण व्यवस्था है। यहाँ हर कोई समान है। यहाँ हर किसी को जीने का समान अधिकार है। इसी लिए मैंनेे 13 जनवरी 2022 को नामविस्तार दिन से पहले पोचीराम कांबळे के जय भीम की ललकार को। अण्णाभाऊ की बुद्ध की शपथ को। मुक्ता सालवे की हम धर्महिन लोग हैं। इस घोषणा को सत्यभामा ताई के संघर्ष को याद करते हुए बुद्ध ही अंतिम सत्य है। यह मानकर बुद्ध की राह चुनी। वहीं ब्रम्हा, विष्णु व महेश को भगवान नहीं मानूंगा और उनकी पूजा-अर्चना नहीं करूंगा। मैं राम कृष्ण को भगवान नहीं मानूंगा और उनकी कोई भी उपासना नहीं करुंगा। इन 22 प्रतिज्ञाओं को ग्रहण कर बुद्ध धर्म अपनाया…।

[लेखक, अजय कसबे पत्रकार व समता कला मंच के सदस्य हैं।]

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

The Mooknayakhttps://themooknayak.in
The Mooknayak is dedicated to Marginalised and unprivileged people of India. It works on the principle of Dr. Ambedkar and Constitution.

Related Articles

मध्य प्रदेशः 10 हजार स्वास्थ्य केंद्र बनेंगे मॉडल, सर्व सुविधायुक्त होंगे अस्पताल

प्रथम चरण में 23 जिलों में 500 हेल्थ एंड वेलनेस एवं 23 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को आदर्श...

अब कीटनाशक भी ऑनलाइन शॉपिंग मार्किट में, पढ़िए कृषि विशेषज्ञ व किसानों ने क्या दी राय

जयपुर। अब किसान फ्लिपकार्ट (flipkart) व ऐमाजॉन (amazon) ई-कॉमर्स साइट्स से भी कीटनाशक खरीद सकेंगे। केंद्र सरकार ने ऐसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स...

दादी-पिता ने 6 माह की नवजात बच्ची को फेंका,पुलिस ने आरोपियों को किया गिरफ्तार

लखनऊ। यूपी के पीलीभीत में गत 18 नवंबर को झाड़ियों में नवजात शिशु पड़ा हुआ मिला था। इस मामले में पुलिस ने...
- Advertisement -

Latest Articles

मध्य प्रदेशः 10 हजार स्वास्थ्य केंद्र बनेंगे मॉडल, सर्व सुविधायुक्त होंगे अस्पताल

प्रथम चरण में 23 जिलों में 500 हेल्थ एंड वेलनेस एवं 23 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को आदर्श...

अब कीटनाशक भी ऑनलाइन शॉपिंग मार्किट में, पढ़िए कृषि विशेषज्ञ व किसानों ने क्या दी राय

जयपुर। अब किसान फ्लिपकार्ट (flipkart) व ऐमाजॉन (amazon) ई-कॉमर्स साइट्स से भी कीटनाशक खरीद सकेंगे। केंद्र सरकार ने ऐसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स...

दादी-पिता ने 6 माह की नवजात बच्ची को फेंका,पुलिस ने आरोपियों को किया गिरफ्तार

लखनऊ। यूपी के पीलीभीत में गत 18 नवंबर को झाड़ियों में नवजात शिशु पड़ा हुआ मिला था। इस मामले में पुलिस ने...

मध्य प्रदेश: वन संरक्षण के लिए आदिवासी युवाओं को रोजगार से जोड़ रहा वन विभाग

वन उपज को एकत्र कर जीवनयापन करने वाले आदिवासी युवकों के लिए विभाग ने शुरू किया कौशल विकास कार्यक्रम।

खबर का असरः सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने लगा दूध

जयपुर। राजस्थान के सरकारी विद्यालयों व मदरसों में अध्ययनरत कक्षा 1 से 8वीं तक के बच्चों को अब प्रत्येक मंगलवार व शुक्रवार...