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Sunday, July 3, 2022

CBSE पाठ्यक्रम में कब-कब हुए बड़े बदलाव, जानें इस बार क्या हटाया और क्या जोड़ा गया है…

CBSE यानि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड भारत में शिक्षा के लिए सबसे बड़ा बोर्ड रहा है. भारत के कई निजी और सरकारी स्कूल इस बोर्ड से संबद्ध हैं, इसलिए भारत में अधिकांश छात्र सीबीएसई बोर्ड के छात्र हैं. यह बोर्ड भारत की केंद्र सरकार द्वारा चलाया जाता है. सीबीएसई की स्थापना भारत सरकार द्वारा वर्ष 1929 में की गई थी. कुल मिलाकर 26,054 स्कूल हैं जो भारत में सीबीएसई से संबद्ध हैं. इसके साथ ही विदेशों में 240 और स्कूल हैं जो सीबीएसई से संबद्ध हैं.

सीएसबीई बोर्ड से संबद्ध सभी स्कूल कक्षा 9वीं से 12वीं के लिए समान पाठ्यक्रम का पालन करते हैं. सीबीएसई बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष विनीत जोशी हैं जो एक आईएएस भी हैं. सीबीएसई से संबद्ध सभी स्कूलों को एनसीईआरटी द्वारा जारी किए गए पाठ्यक्रम का पालन करने का निर्देश दिया गया है. यह नियम कक्षा 9 वीं से 12 वीं के लिए लागू है क्योंकि कक्षा 10 वीं और 12 वीं की अंतिम परीक्षा सीबीएसई द्वारा आयोजित की जाती है.

अब केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने सत्र 2022-23 के लिए पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव किये हैं. बोर्ड ने कक्षा 11 और 12 के इतिहास एवं राजनीति विज्ञान पाठ्यक्रम से — गुटनिरपेक्ष आंदोलन, शीतयुद्ध के दौर, अफ्रीकी-एशियाई क्षेत्रों में इस्लामी साम्राज्य के उदय, मुगल दरबारों के इतिहास और औद्योगिक क्रांति से संबंधित अध्याय हटा दिए हैं.

इसी तरह, कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में —’खाद्य सुरक्षा’ से संबंधित अध्याय से — ‘कृषि पर वैश्वीकरण का प्रभाव’ विषय को हटा दिया गया है. इसके साथ ही ‘धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति-सांप्रदायिकता धर्मनिरपेक्ष राज्य’ खंड से — फैज अहमद फैज’ की दो उर्दू कविताओं के अनुवादित अंश को भी इस साल बाहर कर दिया गया है. सीबीएसई ने पाठ्यक्रम सामग्री से ‘लोकतंत्र और विविधता’ संबंधी अध्याय भी हटा दिए हैं.

फैज की ये नज्में हटीं-

इतनी मुलाकातों के बाद भी हम अजनबी रहते हैं, इतनी बारिश के बाद भी खून के धब्बे रह जाते हैं.

आज, जंजीरों में जकड़े सार्वजनिक चौक में चलो.

सीबीएसी के नए सिलेबस से हटाए गए अंशों में दो पोस्टर और एक राजनीतिक कार्टून शामिल हैं. पोस्टर में फैज की नज्म का अंश लिया गया था. जानकारी के अनुसार इनमें से एक नज्म फैज ने तब लिखी थी जब उन्हें लाहौर की जेल से जंजीरों में बांधकर तांगे से एक दंत चिकित्सक के पास ले जाया जा रहा था। वहीं, दूसरा अंश फैज की साल 1974 में ढाका यात्रा के दौरान लिखी गई कविता से लिया गया है. बताया जाता है कि, फैज की नज्में हमेशा तत्कालिन सरकारों को आईना दिखाने का काम करती हैं. तानाशाही और लोकतंत्र विरोधी ताकतों के खिलाफ एक हथियार का काम करती रही हैं.

नए सिलेबस के मुताबिक, सीबीएसई ने साल में सिर्फ एक बार बोर्ड परीक्षा कराने का फैसला किया है. पिछले साल बोर्ड ने साल में दो बार बोर्ड परीक्षा आयोजित करने का फैसला किया है. लेकिन अब वे पुरानी पैटर्न पर वापस आ गए हैं कि बोर्ड परीक्षा साल में केवल एक बार आयोजित की जाएगी जो मार्च-अप्रैल में आयोजित होगी. नए सिलेबस के अनुसार, अंतिम बोर्ड परीक्षा 80 अंकों की परीक्षा होगी. शेष 20 अंक आंतरिक मूल्यांकन के लिए होंगे.

आपको बता दें कि, कोविड-19 के कारण लंबे समय से देशभर में स्कूल बंद हैं. हालांकि, कई राज्यों में स्कूलों को दोबारा खोला गया है, लेकिन क्लासेज वैसे नहीं संचालित हो रही हैं, जैसा कोरोना से पहले संचालिक की जाती थीं. वहीं, कक्षाएं नहीं संचालित होने की वजह से छात्रों का कोर्स भी नहीं पूरा हो पा रहा है, जिसकी वजह से छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है. यही कारण है कि अगले शैक्षणिक सत्र से इस गैप को जल्द से जल्द भरने और बच्चों से पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के लिए एनसीईआरटी द्वारा फैसला लिया जा रहा है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनसीईआरटी द्वारा अगले वर्ष के लिए क्लास 1 से 5वीं तक की किताबों में कुछ बदलाव भी कर दिए गए हैं. अब इसे क्लास 6 से 12वीं तक लागू करने पर कार्य किया जा रहा है.

पाठ्यक्रम में किये जाने वाले ये बदलाव बिलकुल भी नये या चौकांने वाले नहीं है क्योंकि समय-समय पर सत्ताधारी दलों ने इसमें अपनी राजनीति के हिसाब से बदलाव किये हैं.

द टेलीग्राफ के मुताबिक, 2001 से अब तक एनसीईआरटी ऐसे दो रिव्यू एक्सरसाइज कर चुका है. और 2018 तक एनसीईआरटी के 182 किताबों में कुल 1,334 बदलाव किए गए थे.

2001 में वाजपेयी सरकार के दौरान भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव का प्रयास किया गया. द न्यूय़ार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का मानना है कि भारत की पाठ्य पुस्तकों के पाठ्यक्रमों में भारत की ताकतों की तरफ ठीक से ध्यान नहीं दिया गया है.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी की सरकार पाठ्यक्रम में बदलाव पर काफी बवाल हुआ. तब कई इतिहासकारों ने सुप्रीम कोर्ट में य़ाचिका देकर इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की थी. लेकिन फैसला उनके पक्ष में नहीं आया और किताबों की दुकान पर रातोंरात इतिहास की नई किताबें बिकने लगी.

Arun Kumar
Arun Kumar, Journalist The Mooknayak

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