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Monday, August 8, 2022

यूपी: सूखने लगी धान की पौध, खेतों में पड़ी दरारें, किसान चिंतित

कृषि विशेषज्ञों का अनुमान, 90 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकती है धान की खेती। बरसात नहीं हुई तो दलहन फसलों व सब्जियों पर भी पड़ेगा असर।

लखनऊ/कुशीनगर/बस्ती। मौसम में हो रहे आकस्मिक व अनियमित बदलाव से खेती-किसानी प्रभावित हो रही है। पहले तो मार्च माह में ही गरमी शुरू हो गई। समय से पहले हीट वेव चलने से गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा, तो आम की फसल भी 25 फीसदी तक कमजोर पड़ गई। अब तपती गर्मी और बारिश के बढ़ते इंतजार के बीच खेतों में खड़ी धान की पौध (बेढ़) सूखने की कगार पर है। कृषि विशेषज्ञों का भी कहना है कि धान समेत खरीफ़ की फसलों के लिहाज से आने वाला एक हफ्ता अहम है।

लखनऊ में आंचलिक मौसम विज्ञान केंद्र के डायरेक्टर जेपी गुप्ता बताते है कि, उत्तर प्रदेश में मानसून की बारिश बंगाल की खाड़ी से उठने वाली नम हवाओं पर निर्भर रहती है। हालांकि, इसी बीच उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के उत्तर में कम दबाव का क्षेत्र बन गया, जिसने मानसूनी हवाओं को उस तरफ खींच लिया। यूपी में बारिश के लिए जो नमी और तापमान चाहिए, वह नहीं बन पा रहा है।

कुशीनगर जिला कृषि अधिकारी प्यारे लाल का कहना है कि, यह मौसम धान की रोपाई के साथ उड़द और अरहर, ज्वार, बाजार, मक्का सफेद तिल और कुछ सब्जियों की खेती के लिए उपयुक्त है। यदि एक सप्ताह में बरसात नहीं होती है तो धान और दलहनी फसलों और सब्जियों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। जुलाई के अंत तक बारिश से धान की फसल की रोपाई 10 फीसदी हो जाए तो भी बड़ी बात होगी। ऐसे में 90 प्रतिशत तक फसल प्रभावित हो सकती है।

ट्यूबल से सिंचाई का खर्च भारी

हरदोई जिले के कोथांवा ब्लॉक की ग्राम पंचायत लोधौरा प्रधान व किसान अभिषेक कुमार ने बताया कि, “ब्लॉक के 55 ग्राम पंचायतों में से 25 ग्राम पंचायतों में ही नहर से सिंचाई हो पाती है। अन्य कृषि जोतों में ट्यूबेल का सहारा लिया जाता है जो महंगा पड़ता है। एक बीघे में पानी लगाने में 12 से 13 घंटे लगते हैं। हर घंटे का खर्च 225 रूपए आता है। तेज धूप से पानी लगाते ही सूख जाता है।”

बस्ती जिले के किसान विजय कुमार चौधरी ने बताया कि, “सूखे के हालात हैं। बूंदाबांदी तक नहीं हुई है। अगर यही हालत रहे तो एक दो पानी लगाकर छोड़ देंगे।”

अनुज शर्मा, सपहां [फोटो- बृजेश शर्मा, द मूकनायक]
अनुज शर्मा, सपहां [फोटो- बृजेश शर्मा, द मूकनायक]

कुशीनगर के ग्राम पंचायत सपहां निवासी अनुज कुमार शर्मा (28) बताते हैं कि, मानसूनी सीजन में बारिश नहीं होने से रोपाई की गई धानों के लिए बुरा साबित हो रही है, खेतों में दरारें फट चुकी हैं।

मोतीलाल प्रसाद, स्थानीय निवासी [फोटो- बृजेश शर्मा, द मूकनायक]
मोतीलाल प्रसाद, स्थानीय निवासी [फोटो- बृजेश शर्मा, द मूकनायक]

स्थानीय निवासी मोतीलाल (70) बताते है कि, रोपाई के समय भी बारिश नहीं हुई, जिसकी वजह से खेती करना मुश्किल हो गया है। अब धान की फसल मुरझाने लगी है।

बिजली भी कर रही है आंख मिचौली

लो वोल्टेज व बिजली कटौती ने मुश्किलें बढ़ा दी है। किसानों के लिए लगे नलकूप भी पानी नहीं उलीच (भूमिगत सतह से पानी बाहर नही आ रहा) पा रहे हैं। वहीं नहरों में पानी की समस्या तो जरूर खत्म हो गईं है, लेकिन नहर के पानी का लाभ सभी किसानों को नहीं मिल रहा। उन किसानों को ही मिल रहा है, जिनके खेत नहरों के आस-पास हैं।

महज 78 प्रतिशत भूमि सिंचित

कुशीनगर जिले में 4,62,694 भू जोतों की संख्या के साथ कुल क्षेत्रफल 2,32,507 हैक्टेयर है। 97 प्रतिशत किसान लघु और सीमांत श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। वहीं शुद्ध बोई जाने वाली 2.25 लाख हैक्टेयर भूमि में से 1.71 लाख हैक्टेयर भूमि अर्थात 78 प्रतिशत भूमि सिंचित है। मानसून कमजोर होने से वैकल्पिक साधनों का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे कृषि लागत बढ़ गई है।

कृषि बीमा जरूरी

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि, इन हालातों में किसान फसल बीमा करवा लें। धान की फसल का बीमा कराने की अंतिम तिथि 31 जुलाई है। एक हैक्टेयर फसल का बीमा कराने का प्रीमियम 12 सौ रुपए होगा। इसमें 42 हजार रुपए प्रति हैक्टेयर बीमा राशि फसल खराबा, आपदा या सूखा की स्थिति में सरकार देगी। पीएम फसल योजना के तहत हर ब्लॉक व तहसील स्तर पर 15 जुलाई से कैम्प लगेंगे।

क्या कहते हैं जिम्मेदार?

यूपी के कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही कहते हैं कि, राज्य सरकार किसानों को किसी परिस्थिति मे अकेला नहीं छोड़ेगी। जल शक्ति विभाग की मदद से किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जा रहा है।

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक वीडीओ ट्वीट करते हुए यूपी में बारिश न होने पर व्यंग किया है।

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