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Monday, August 8, 2022

The Mooknayak 2nd Session: जातीय मुद्दों पर फिल्में क्यों नहीं बनाता है बॉलीवुड?

किसी दलित किरदार के लिए दलित या आदिवासी समुदाय से एक्टर आते हैं तो आने वाला वक्त जरुर अलग हो जाएगा, क्योंकि उस किरदार को असल जिंदगी में जीने वाला होना चाहिए” -फिल्म निर्देशक नीरज घेवाण

नई दिल्ली: रविवार, 30 जनवरी को वर्चुअल माध्यम से द मूकनायक द्वारा आयोजित विभिन्न मुद्दों पर ऑनलाइन परिचर्चा के क्रम में द मूकनायक पैनल के सेशन में बेहतरीन वक्ता जुड़े। द मूकनायक के साथ फिल्म अभिनेत्री रिचा चड्ढा और फिल्म निर्देशक नीरज घेवाण ने कई मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला। इनके साथ द मूकनायक फाउंडर मीना कोटवाल और पत्रकार शाहबाज अंसार चर्चा में शामिल रहे। चर्चा का मुद्दा जातीय मुद्दोॆं पर फिल्मों को लेकर रहा।

आखिर जातीय मुद्दों पर बॉलीवुड फिल्में क्यों नहीं बनाता?

जातीय मुद्दों पर वॉलीवुड के फिल्म न बनाने के सवाल पर फिल्म निर्देशक नीरज घेवाण ने कहा कि, “फिल्म इंडस्ट्री में जातीय मुद्दों पर फिल्में नहीं बनती क्योंकि लोगों को इन मुद्दों के बारे में पता ही नहीं है। इसलिए उस मुद्दे पर फिल्म ही नहीं बनती।”

रिचा चड्ढा ने कहा, “फिल्म इंडस्ट्री में लोग इस मुद्दे पर बात तो करते हैं लेकिन 10 में से एक ही इंसान इस मुद्दे पर बात करने के लिए सामने आता है। वैसे भी लोग किताबें कम पढ़ते, इसलिए इस मुद्दे की फिल्में नहीं बनती। लेकिन साउथ में हम देखते हैं कि लोग इन मुद्दों को सामने रखते हैं। इस पर एक चर्चा बहुत जरुरी है, और लोगों का जागरुक होना बहुत जरुरी है।”

हिंदी सिनेमा में बहुत कम फिल्में जातीय मुद्दों पर बनती है और जो भी फिल्में आती है उनमें बारिकियां नहीं होती। क्या सिनेमा को ये लग रहा है कि इन मुद्दों पर फिल्में बनना जरुरी है, के सवाल पर नीरज जी ने कहा, “साउथ में हम जातीय मुद्दों पर फिल्में बनती देख सकते हैं। यहां लोकल पॉलिटिक्स स्ट्रांग है इस वजह से सिनेमा में भी ये मुद्दे देखने को मिलते हैं।”

“जय भीम जैसी फिल्म बनी उसमें दलित एक्टर तो नहीं है लेकिन मुद्दों को डिटेल में दिखाया गया है। साउथ में अवेयरनेस है वहां पर लोग हैं जो इस मुद्दे पर बात करना चाहते हैं जबकि हिंदी सिनेमा में ऐसा नहीं है। कास्ट को यहां लोग क्लास समझ लेते हैं। इस वजह से यहां उन मुद्दों को सामने नहीं रखते। यहां पर लोगों को पता ही नहीं है कि जातिवाद क्या है और जातिसूचक शब्द क्या हैं।” – नीरज ने कहा।

हमारी हिंदी फिल्में है उसमें कुछ ऐसे शब्द हैं जो जातिसूचक शब्द हैं.. उनको लेकर क्या राय है, के सवाल पर रिचा चड्ढा ने बताया, “वास्तविकता ये है कि हमें पता ही नहीं है कि जातिसूचक शब्द क्या है। हम पास्ट में जाकर वो चीजें तो नहीं बदल सकते लेकिन आने वाले समय में हम ऐसी अथॉरिटी में है कि हम ये ध्यान रख सकते हैं कि ऐसी चीजें दोबारा ना हो, हमें अपनी गलती का ऐहसास हो और उसको बदलने के लिए हम तैयार हो।”

इसी सवाल के जवाब में नीरज ने कहा कि, अगर कोई अपनी गलती से सीख लेकर उसे आगे सुधारना चाह रहा है तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए। आज लोग अवेयर हो रहे हैं तो उसे बदलने की तैयारी भी कर रहे हैं।

बॉलीवुड फिल्मों में जो दलित है वो गरीब होंगे और अगर मुस्लिम होंगे तो वो आंतकवादी की ही भूमिका में होंगे, ऐसा क्यों हैं, के जवाब में रिचा चड्ढा ने कहा, “लोग अपनी आइडेनटिटी छुपा लेते हैं। सवाल उठाने की जगह चुपचाप से अपनी आइडेनटिटी को छुपा लेना ही सही समझते है। हम स्टिरियो टाइप के समय में इग्जिस्टिट करते हैं। सवाल उठाकर अपने पेट पर लात मारने से बेहतर अपनी आइडेंटिटि को न बताना बेहतर विकल्प समझते हैं।”

नीरज ने कहा कि, “आज के समय में बड़े ही सटीक तरीके से इस्लामोफैबिया दिखाई दे रहा है। किसी को गाली देना लोगों को बुरा नहीं लगता लेकिन बुरा ये लगता है कि उसको नॉर्मलाइज कर दिया जाता है। फिल्मों में गलत को नॉर्मलाइज कर दिया जाता है और इसको देखकर आम जनता के बीच एक मैसेज जाता है कि अगर फिल्म में दिख रहा है तो आम जिंदगी में भी वही सही है।”

समाज में जातिवाद दिखाना सही है लेकिन जातिवाद को ग्लोरिफाई करना कितना सही है?

सवाल के जवाब में नीरज ने कहा, “ये चीज गलत है। इसको फिल्मों में दिखाना सौ प्रतिशत सही है लेकिन आपको ये भी बताना जरुरी है कि ये गलत है। उसको दिखाना बस लक्ष्य नहीं है बल्कि ये गलत है और इसको खत्म करना है इसको लक्ष्य रखकर फिल्म बनानी चाहिए।”

“लोगों को खुद नहीं पता कि हम कहां गलत हैं। हमारी आंखों के सामने वही दिखता है जो बचपन से हमें दिखाया जाता है। जहां बचपन से ही कास्टिस्जिम दिखाया और बताया गया है वो हम उसी चश्में से देखते है। अगर हम उसे उसी चश्में से देखते हैं तो हम फिल्में भी उसी सोच पर बनाएंगे।” -रिचा चड्ढा ने कहा।

“किसी दलित किरदार के लिए दलित को ही कास्ट क्यों नहीं किया जाता ये सवाल बहुत आता है तो इसको समझने की जरुरत है। जो एक किरदार है उसको जीने वाला चाहिए। उस किरदार को जीवंत बनाने के लिए एक अच्छा एक्टर होना चाहिए। उस किरदार में एक भाषा है .. एक्टिंग है .. बॉडी लैंग्वेज होती है उसको जीने के लिए एक एक्टर की जरुरत है।” -नीरज ने कहा।

“आज के समय में दलित एक्टर ये नहीं बोलता कि हम दलित है। ये साफ है कि एक किरदार को जीवंत बनाने के लिए एक एक्टर की जरुरत होती है तो उस एक्टर को हम चूज करते हैं। ताकि वो किरदार जनता के दिल को छू सके। अगर आने वाले समय में दलित या आदिवासी समुदाय से एक्टर आते हैं तो जरुर आने वाला वक्त अलग हो जाएगा।” -नीरज उम्मीद जताते हुए कहते हैं।

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