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Friday, October 7, 2022

ग्राउंड रिपोर्टः सिंध और हिंद को जोड़ने वाली थार एक्सप्रेस जोह रही समझौते की बाट

भारत-पाकिस्तान के बीच में चलने वाली थार एक्सप्रेस लंबे समय से बंद, यात्रियों को करना पड़ रहा है भारी मुश्किलों का सामना

जैसलमेर। सिंध और थार इस समूची फैली जमीन पर दो बहनों की तरह फैला प्रदेश था. इसमें सिंध यानी की पाकिस्तान के सिंध प्रांत में फैला मरुस्थल और थार यानी की हिंदुस्तानी मरुस्थल. आजादी के पूर्व तक सब कुछ यथावत था. दोनों देशों के बीच हुए बंटवारे में पाकिस्तान के हिस्से आया थोड़ा सा हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के दिल में रह गया पाकिस्तान. सिंध और थार हेत-प्रेम की मिशाल थीं और यहां के रहवासी यहां का गौरव. इसके बचे रहने का कारण था यहां के रोटी-बेटी के साझे रिश्ते. लेकिन अब नए रिश्तों को बनाने व पुराने रिश्तों को निभाने पर रोक लग गई है, इसका सबसे बड़ा कारण है थार एक्सप्रेस रेल सेवा का बंद हो जाना। रेल संचालन बंद होने के बाद से ही भारत के लोग पाकिस्तान में अपने परिजनों से नहीं मिल पा रहे हैं न ही पाकिस्तान के लोग भारत में अपने परिजनों से मुलाकात कर सुख-दुख बांट पा रहे हैं।

2019 से बंद है थार एक्सप्रेस

भारत पाक के बीच चलने वाली थार एक्सप्रेस 11 अगस्त 2019 से बंद है। इस रेल को भारत और पाक दोनों देश शुरू नहीं कर रहे हैं। भारत-पाकिस्तान के विभाजन से पहले यहां रेलमार्ग था और कराची तक रेल जाती थी। 1965 के युद्ध में रेल पटरियां उखडने के बाद रेल बंद हो गई और 41 साल बाद 18 फरवरी 2006 को ब्रॉडगेज लाइन बिछाकर दोनों देशों ने थार एक्सप्रेस का संचालन प्रारंभ किया। रेल पुलवामा हमले तक अनवरत 11 अगस्त 2019 तक चली। हर फेरे में करीब 700 यात्री भारत-पाक से सफर कर रहे थे और चार लाख यात्री आए-गए।

क्यों बंद किया गया थार एक्सप्रेस!

पुलवामा हमले के बाद में दोनों देशों मेें तनाव हुआ तो इस रेल को बंद कर दिया गया। 9 अगस्त 2019 को भारत रेल आई और 11 अगस्त को भारत से रेल गई थी। दोनों देशों ने इसके बाद इस रेल को शुरू करने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

इसी प्रकार भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने और राज्य के पुनर्गठन के बाद पाकिस्तान ने कई कड़े कदम उठाए थे. इनमें समझौता एक्सप्रेस को बंद करने का भी निर्णय था। इस ट्रेन को शिमला समझौते के बाद 22 जुलाई 1976 को लाहौर से अमृतसर के बीच शुरू किया गया था. बाद में 1994 में इसे अटारी और लाहौर के बीच चलाया जाने लगा था.

थार एक्सप्रेस शुरू करना क्यों है जरूरी!

पाकिस्तान का सिंध और भारत का थार दोनों ही रोटी-बेटी के रिश्ते से जुड़े हैं। 1947 के बाद करीब एक लाख पाक विस्थापित बाड़मेर में और पूरे देश में लाखों विस्थापित हैं। अभी भी इन परिवारों के लोगों का पाकिस्तान-भारत आना जाना है। कोई बेटी वहां है तो कोई बेटी यहां पर। यहां तक कि मां उधर है तो बेटा यहां रह रहा है। रिश्तों की ऐसी नाजुक डोरी के बीच में खींची सरहद में यह रेल ही मेल-मिलाप का जरिया रही है।

मुनाबाओ में है रेलवे स्टेशन

थार एक्सप्रेस के लिए राजस्थान में बाड़मेर जिले के मुनाबाओ में अंतरर्राष्ट्रीय स्तर का रेलवे स्टेशन बना हुआ है. इस रेलवे स्टेशन पर भारत सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च किए, जहां इमीग्रेशन व अन्य जांच होती है. थार एक्सप्रेस का संचालन नहीं होने से यह बंद पड़ा है.

जोधपुर रियासत ने शुरू की थी सेवा

थार एक्सप्रेस एक अंतर्राष्ट्रीय रेलगाड़ी है जो पाकिस्तान में कराची एवं भारत में जोधपुर शहरों को आपस में जोड़ती है. 1965 तक यह रेल जोधपुर रेलवे के नाम से जानी जाती थी. जोधपुर रियासत के खर्चे पर शुरू हुई यह रेल सेवा करांची पहुँचने से पहले अपनी यात्रा के दौरान जमराव, सैंदद, पिथारू, ढोरो नारो, छोरे एवं खोखरापार स्टेशनों से होकर गुजरती है। कस्टम से संबंधित कागजातों की जाँच भारत में बाड़मेर एवं पाकिस्तान में मीरपुर खास स्टेशनों पर की जाती है। यह 329 किलोमीटर की दूरी तय करती है।

ट्रेन बंद होने से मेल-मुलाकात बंद

सुदूर जैसलमेर से सटे सोढान क्षेत्र के हिंदू सिंह बताते है “थार और सिंध यहां केवल जमीन के टुकड़े भर नही थे. यहां के लोगों की धमनियों में दौड़ने वाले रक्त का नाम था। बेटियां मनुष्य के आंतरे (आंतड़ियां) हैं और सिंध और थार ने एक दूसरे से अपनी आंतड़ियों को सदियों साझा किया है. नफरत और द्वेष से भरे इस माहौल ने कई बार बदलने को कोशिश की लेकिन जीत हर बार मुहब्बत की हुई।”

वे आगे बताते हैं, “आजादी के बाद से अब तक बेटी और रोटी का रिश्ता थार और सिंध के लोगों के बीच कायम रहा, लेकिन अब थार व समझौता एक्सप्रेस बंद होने से इस पर खतरा मंडरा रहा है. आवाजाही बंद होने से रिश्तेदार सोशल मीडिया के माध्यम से दूसरे देश में बैठे परिजनों से बात कर पा रहे हैं. यह बहुत कठिन समय है, लेकिन हम इस से निजात पाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं”

सीमावर्ती इलाकों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता आजाद सिंह बाड़मेर बताते है कि, “पाकिस्तान के सिंध में भी सोढ़ा राजपूतों के बहुतेरे परिवार रहते हैं और ये सोढा राजपूत परमार राजपूत कुल के वंशज हैं। सोढा राजपूत अपनी रोटी-बेटी के रिश्ते को लेकर आज भी थार के बाशिंदों की तरफ टकटकी भरी निगाहों से देखते हैं। विषय परिस्थितियों के बावजूद भारत-पाक को जोड़ती हुई यह प्रेम भरी शादियां धूमधाम से होती हैं”

वे आगे कहते है, “रेगिस्तानी इलाकों में इस तरह की शादियों का आम चलन है अतः लगातार आना-जाना भी लगा रहता है. जैसलमेर और बाड़मेर में सोढ़ा राजपूतों की ऐसी कई बहुएं हैं, जिन्होंने शादी के बाद एक बार भी अपने ससुराल यानी हिंदुस्तान को एक नजर देखा तक नहीं। वजह दोनों देशों के बीच वीजा बगैरह जैसी तकनीकी खामियां ही बनती हैं, लेकिन इसके बाद भी साल में 15-20 शादियां पाकिस्तान से भारत में की जाती हैं।”

पाकिस्तान से आए एक परिवार के सदस्य दिलीप सिंह भी हैं. वे इन दिनो जैसलमेर जिले की रेवत ढाणी के रहवासी हैं। वह अपने सिंध और वहां के परिजनों को याद करते हुए कहते हैं, “बंटवारे ने सिंध और थार की आत्मा को झकझोर के रख दिया।” ऐसी ही एक कहानी साजन पुत्र हसन जाति भील की भी है. उसका परिवार थार एक्सप्रेस के अंतिम फेरे में भारत आया था तब उसकी उम्र महज तीन महीने की थी, लेकिन अब वह करीब चार बरस का है. हसन फिलहाल पाकिस्तान के खिपरो तहसील में अपने दादाजी के पास रहता है.

पत्रकार कमल सिंह सुल्ताना कहते हैं, “यह थार के लोगों की विडंबना है कि उन्होंने रेशमा को सिर्फ गीतों में सुना जबकि रेशमा रेत का धड़कता सितारा थी. ठीक उसी तरह दप्पू खान भी मूमल के स्वर को थार में ही गा पाए. न जाने ऐसे गीत और कितने नाम है जिनमें थार – सिंध का साझा लोक धड़कता है।”

वे आगे बताते हैं, “भारत के पंजाबी लोग मन चाहे तब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बैठे स्नेही बांधवों से मिल सकते हैं. हिंदू बंगाली परिवार बांग्लादेशी रिश्तेदारों से मन माफिक मिल सकते हैं. कुछ समय तक थार और सिंध के लोग भी सहज आ जा सकते थे लेकिन थार व समझौता एक्सप्रेस बंद होने से वे लगातार परेशानियों का सामना कर रहे हैं. खास कर वे लोग जिनका आधा परिवार थार में रह गया और बाकी सिंध में छूट गया है.”

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