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Friday, October 7, 2022

राजस्थान: सरकारी सुविधाएं न मिलने पर पुश्तैनी काम छोड़ मजदूरी करने को मजबूर ‘मुस्लिम कुम्हार’, कला के विलुप्त होने का संकट

मिट्टी के बर्तनों को बनाने वाले पंसमादा मुस्लिमों के सामने लागत ज्यादा, आमदनी कम की चुनौती। मिट्टी के बर्तन बनाने के कारोबार से परिवार का भरण-पोषण न कर पाने से अधिकांश हुनरमंद पुश्तैनी कारोबार छोड़ मजदूरी करने को हुए विवश।

राजस्थान। भारत के इतिहास में हजारों वर्षों से मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता आ रहा है। बीते कुछ वर्षों पहले तक गांवों में मिट्टी के बने बर्तनों का उपयोग खूब किया जाता था। लेकिन सरकारों की उदासीनता के कारण मिट्टी के बर्तन बनाने वाले मुस्लिम कुम्हार परिवारों को इस कारोबार को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। वर्तमान में प्लास्टिक व फाइबर के अत्याधुनिक उत्पादों के कारण मिट्टी बर्तन व्यवसाय पर बुरा प्रभाव पड़ना भी इस कारोबार को खत्म होने का एक प्रमुख कारण है। लघु उद्योग के रूप में व्यवसाय कर रहे हुनरमंद मिट्टी बर्तन व्यवसायियों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। मौजूदा समय में इस कारोबार से परिवार का भरण-पोषण न कर पाने से अधिकांश हुनरमंद पुश्तैनी कारोबार छोड़ मजदूरी करने को विवश हैं।

मिट्टी के बर्तन बनाने वाले मुस्लिम कुम्हारों (पंसमादा मुस्लिम) का काम बदलते जमाने में बंद होने की कगार पर है‌। दीपावली के समय ही मिट्टी के बर्तन उपयोग में आते हैं। इसके अलावा सिर्फ चाय की दुकानों पर कुल्हड़ का इस्तेमाल किया जाता है। इस कारण मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों का परिवार अपने पुश्तैनी काम को छोड़कर मजदूरी को मजबूर है।

अपने चाक पर काम करते जमाल ख़ां [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]
अपने चाक पर काम करते जमाल ख़ां [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]

द मूकनायक से बात करते हुए बाड़मेर जिले के धारणा ग्राम पंचायत निवासी जमाल ख़ां (52) बताते हैं कि, सरकार से आज तक उन्हें इसके लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली है‌। न ही उन्हें किसी योजना के बारे में जानकारी दी जाती है, और न ही सरकारों ने कभी भी कुम्हारी कला के लिए ध्यान ही दिया। वह उदास होकर कहते हैं, “मुख्यमंत्री कौन हैं, हमे तो यह भी नहीं पता। अनपढ़ गंवार हैं हम।”

एकान्त में झोपड़ी में मिट्टी का मटका बनाते सिवाना निवासी मीर खां [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]
एकान्त में झोपड़ी में मिट्टी का मटका बनाते सिवाना निवासी मीर खां [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]

बाड़मेर के सिवाना निवासी मीर खां (60) द मूकनायक से बताते हैं, “हम दीपावली में दीयों से लोगों के घर उजाला करते हैं लेकिन आज के समय में इस काम से आज हमारे घर में चूल्हे तक नहीं जल पा रहे हैं। मिट्टी से बर्तन बनाने का हमारा पुश्तैनी काम धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया है, हमारे सामने रोजी-रोटी का संकट गहराने लगा है।”

बाड़मेर जिले के सिवाना नगर पालिका निवासी फिरोज खान बताते हैं कि, आधुनिकता के इस दौर में मिट्टी से बने बर्तन पिछड़ते जा रहे हैं। लोगों के स्वास्थ्य को स्वस्थ बनाए रखने वाले इन बर्तनों से लोग अब दूरियां बना रहे हैं। कुछ सालों पहले तक जहां बाजारों में मिट्टी के मटके, सुराही, चूल्हे, चिलम इत्यादि मिलते थे, आज मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन लगातार घट रहा है।

बर्तन बनाने के लिए लायी गयी मिट्टी [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]
बर्तन बनाने के लिए लायी गयी मिट्टी [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]

दूसरे गांवों से खरीदनी पड़ती है मिट्टी

मिट्टी के बर्तन बनाने वाले परिवार बताते हैं कि, पहले मिट्टी की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती थी लेकिन अब मिट्टी का मोल भाव होने लगा है। पहले गाँव के बाहर खेत होते थे, जहां से मिट्टी के बर्तन व प्रतिमा के लिए मिट्टी लाते थे। लेकिन, अब यहां घर बन गए हैं, इसलिए मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया है। अब मिट्टी प्रति ट्राली 4000-5000 के हिसाब से खरीदी जा रही है। “मिट्टी से बर्तन बनाने का हमारा पुश्तैनी काम है। इसके अलावा करें तो क्या करे..!” मीर खां हल्का सा मुस्कुराते हुए कहते हैं कि पढे लिखे नहीं हैं भाई साहब! ये काम नहीं करेंगे तो भुखे मर जाएंगे।

चाक पर बर्तन बनाने के लिए बनाये गए मिट्टी के गोंदे [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]
चाक पर बर्तन बनाने के लिए बनाये गए मिट्टी के गोंदे [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]

कैसे बनते हैं मिट्टी के बर्तन?

राजस्थान के बाड़मेर जिले में छोटे गांवों में मिट्टी के बर्तन बनाने वाले परिवारों से द मूकनायक ने उनके घर जाकर उनसे उनकी परेशानियों और कारोबार में आने वाली चुनौतियों के बारे में बात की। वह बताते हैं कि, मिट्टी का बर्तन बनाने के लिए सबसे पहले मिट्टी की आवश्यकता होती है। बाहर से लाई गई मिट्टी का पहले महीन चूरा किया जाता है। उसके बाद, इसे पानी में कई घंटों तक रौंदा जाता है, फिर इसे कई घंटों तक भिगोया जाता है। इसके बाद इसे आटे की तरह गूंथकर चाक पर चढ़ाया जाता है, और कुशल हाथों से इसे दीपक, कलश, गमले, गुल्लक आदि का रूप दिया जाता है।

बर्तन बनाते समय उपयोग लिया जाने वाला पानी का मटका [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]
बर्तन बनाते समय उपयोग लिया जाने वाला पानी का मटका [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]

इस तरह बने इन कच्चे बर्तनों को कुछ समय धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद मिट्टी से बने हांव (भट्टी) में कई घंटों तक पकाया जाता है। ठंडा होने के बात इन बर्तनों पर रंग-बिरंगे रंगों से डिजाइन बनाकर सुंदर बना दिया जाता है। इसके बाद ही इन्हें बिक्री के लिए भेजा जाता है। इस काम के लिए परिवार के अन्य सदस्यों का भी सहयोग लेना पड़ता है।

फिरोज द्वारा बनाए मिट्टी के बर्तन [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]
फिरोज द्वारा बनाए मिट्टी के बर्तन [फोटो- अजरुद्दीन, द मूकनायक]

‘हम नहीं चाहते हमारे बच्चे इस काम को करें’

मीर खां, जमाल ख़ा, व फिरोज खां का लगभग एक ही मत है कि, “मिट्टी का बर्तन बनाना भी हस्तकला में आता है। अगर सरकार अन्य हस्तकलाओं की तरह हमारे व्यवसाय पर ध्यान नहीं देती है तो वह इस कला को खो देगी। इस पर जल्द कुछ नहीं किया गया तो मिट्टी का बर्तन बनाने वाले जल्दी मिलेंगे ही नहीं। इसमें मेहनत ज्यादा है मजदूरी बहुत कम। हम नहीं चाहते की हमारे बच्चे हमारी तरह ऐसा काम करें।”

Azrudin
अजरूद्दीन स्वतंत्रत पत्रकार हैं. अजरूद्दीन ने जनतंत्र टिवी, जन टिवी राजस्थान, प्राइम न्यूज़ टीवी, मैगजीन प्रिन्ट मीडिया में काम कर चुके हैं. इन्हें पत्रकारिता क्षेत्र में 3 वर्ष हो चुके हैं. अजरूद्दीन ने शुरूआती पढ़ाई बाड़मेर जिले के सिवाना कस्बे से की है. इन्होंने हमेशा दलित, मुस्लिम, पिछड़ों के अधिकारों की आवाज उठाने का काम किया है.

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