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Sunday, August 7, 2022

Opinion: लोकसभा चुनाव 2024 के ठीक 2 साल पहले एक विवादित फिल्म का प्रमोशन करते पीएम मोदी!

भारतीय इतिहास की बहुचर्चित घटना “कश्मीरी पंडितों के नरसंहार” पर हाल ही में बनी फिल्म को बीजेपी शासित राज्यों में कर-मुक्त किया जा रहा है, जबकि फिल्म को लेकर भविष्य में दो समुदायों (हिन्दू-मुस्लिम) के बीच तनाव उत्पन्न होने की आशंका जाहिर की जा रही है।

कश्मीर में, 1990 में भयावह रूप से शुरू हुए सांप्रदायिक विवाद के दौरान कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं के नरसंहार और भारी संख्या में उनके पलायन और मौजूदा परिस्थितियों को चित्रित करने वाली फिल्म “द कश्मीर फाइल्स” बीते कुछ दिनों से भारत में ट्रेंड पर है।

विवेक रंजन अग्निहोत्री द्वारा बनाई गई यह फिल्म, उस हिंसा को चित्रित करने का प्रयास करती है जिसने तीन दशक पहले आतंकवाद के चरम पर घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन को मजबूर किया था।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 मार्च को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की एक संसदीय दल की बैठक में फिल्म उद्योग की भूमिका पर प्रकाश डाला और द कश्मीर फाइल्स की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसे बदनाम करने के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है।

भाजपा शासित राज्यों में फिल्म कर-मुक्त

यह फिल्म अधिकांश भाजपा शासित राज्य सरकारों द्वारा कर मुक्त की गई है। इस फिल्म को अब तक इन राज्यों द्वारा कर-मुक्त घोषित किया है  —  हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, त्रिपुरा, गोवा और उत्तर प्रदेश।

सिनेमाघरों में इस फिल्म के आने के बाद, हिंदुत्ववादी समर्थकों द्वारा इस फिल्म को खूब पसंद किया जा रहा है साथ ही सिनेमा हालों में जय श्री राम के नारे (हिंदुओं का एक धार्मिक नारा) भी लगाए जा रहे हैं।

फिल्म को लेकर भविष्य की चिंताएं

फिल्म को देख चुके अन्य लोग फिल्म के बारे में भविष्य में दो समुदायों (हिन्दू-मुस्लिम) के बीच तनाव उत्पन्न होने की आशंका जाहिर कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि, फिल्म में दिखाए गए दृश भारत के अन्य राज्यों में रहने वाले मुस्लिम समुदायों के लोगों और हिंदुओं के बीच नफरत, अविश्वास और तनाव पैदा करने वाले हैं, और यह हिंदुत्ववादी धार्मिक कट्टरता को बढ़ाता है।

फिल्म देखने के बाद कश्मीरी पंडितों द्वारा हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि, “फिल्म में सिर्फ कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को दिखाया गया है, जबकि उस दौरान अन्य जातियों व धर्मों के लोग भी उस हिंसा में मारे गए थे, यह फिल्म लोगों को बांटने का काम करेगी।”

फिल्म में इस सच को नहीं दिखाया गया

कश्मीर में 1990 के दौरान हुए नरसंहार को चित्रित करने वाली फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि, 1987 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में हुए धांधली के दौरान पाकिस्तान ने वहां के लोगों के बीच जहर बोने का काम किया, और उस मौके को बखूबी भुनाया। 1990 के नरसंहार से पूर्व 1988 से ही वहां मिलिटेंसी शुरू हो गई थी। घाटी के नौजवान लड़के हथियार उठाने लगे, और पाकिस्तान कश्मीर में मिलिटेंसी के लिए जरूरी संसाधन मुहैया करवा रहा था। जबकि फिल्म में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए बर्बरता का प्रमुख कारण एक समुदाय विशेष के लोगों पर केंद्रित करके फिल्माया गया है।

उस समय पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन टोपैक’ की साजिश रची। पाकिस्तानी जनरल जियाउल हक का मानना था कि पाकिस्तान जो काम युद्ध से नहीं कर सका है, वह एक ऐसे एंटी-इंडिया माहौल में किया जा सकता है। जियाउल हक ऑपरेशन टोपैक के जरिए धार्मिक कट्टरपंथ, मिलिटेंसी और अलगाववाद को प्रोत्साहित करना चाह रहा था। कश्मीरी युवाओं को बार्डर पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हथियार और ट्रेनिंग दी जाती थी। इसमें कश्मीरी लड़कों को अपने साथ यह कहकर जोड़ा गया कि ये आजादी की लड़ाई है। कश्मीरी पंडितों को घाटी में धमकाया जाने लगा। इस्लामिक कट्टरपंथ उनसे पूछते कि आप हमारी तरफ (पाकिस्तान के साथ) हैं या उनकी (भारत की तरफ)।

इस माहौल में देश की मौजूदा हालात काफी तेजी से बदल रहे थे। राजीव गांधी की सरकार बोफोर्स घोटाले में घिर चुकी थी। फलस्वरूप वे 1989 का लोकसभा चुनाव भी हार गए। फिर वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। वह राजनीतिक अस्थिरता का दौर था। भारतीय सेना श्रीलंका के गृह युद्ध में उलझी हुई थी। देश की अर्थव्यवस्था भी ठीक नहीं थी। इधर घाटी में इस्लामिक कट्टरपंथियों का दबदबा कायम हो रहा था।

फिल्म 2024 लोकसभा चुनाव की मजबूत तैयारी

इस फिल्म के आने के पीछे का एक अन्य कारण भाजपा का राजनीतिक लाभ भी बताया जा रहा है। देश में आगामी लोकसभा चुनाव 2024 के लिए यह फिल्म पार्टी की सबसे मजबूत तैयारी साबित हो सकती है। क्योंकि नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद देश में हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति चरम पर रही है। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद मुस्लिम समुदाय के युवाओं, महिलाओं, पत्रकारों के साथ कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जो पीएम को सवालों के घेरे में खड़ा करती हैं।

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

Rajan Chaudhary
Journalist, The Mooknayak | Email: rajan.chaudhary@themooknayak.in

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