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Thursday, May 19, 2022

एम. सांगवी के लिए ही बिरसा मुंडा और बाबा साहेब ने कुर्बानी दी थी, सांगवी का सपना, हमारा सपना है!

मीना कोटवाल

जननायक बिरसा मुंडा जी के जन्मदिन पर मुझे आदिवासी लड़की एम. सांगवी और बाबा साहेब की बहुत याद आ रही है. बहादुर एम सांगवी मालासर जनजाति में 12वीं पास करने वाली पहली लड़की है, जिन्होंने NEET क्लियर किया है. पूरी उम्मीद है कि जल्द ही वे डॉक्टर बन मानव सेवा करेंगी, बस पायल तड़वी जैसा माहौल इस मासूम बच्ची को ना देना. बता दूं कि उनकी मां आंशिक रूप से ही देखने में सक्षम हैं. पिछले साल सांगवी ने अपने पिता को खो दिया था. पिता की मौत उनके लिए NEET पास करने की प्रेरणा बनी और आंधी-तूफान से लड़कर वे आज लाखों लड़कियों के लिए उम्मीद की किरण बन गई हैं.

अभी जब महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा जी को याद कर रही थी तो सांगवी का चेहरा बार-बार सामने आ रहा है, बाबा बिरसा अगर गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी जान की बाजी न लगाते तो क्या सांगवी जैसी कहानियां होती देश के सामने? बाबा साहेब आंबेडकर अपने बच्चों की कुर्बानी देकर, वंचित-शोषितों का ख्याल न रखते तो क्या सांगवी जैसी बहादुर लड़कियों से हमारा परिचय हो पाता कभी? मैं जिस समाज से आती हूं वहां ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं लेकिन जिन्हें इन कहानियों को सहेजने का मौका मिला उन्होंने सदियों से हमें इग्नोर किया. सिर्फ एक जाति विशेष में जन्म लेने की वजह से हमें नकार दिया, धिक्कारा, अपने ही देश में गुलाम बना दिया, स्तन कर तक देने को मजबूर किया. खैर शोषण की कहानियों का अंत नहीं है, आज बात मैं संघर्ष की करूंगी.

मैं सुबह से सोशल मीडिया पर देख रही हूं कि बिरसा मुंडा को सिर्फ आदिवासियों का नायक घोषित करने की पूरी कोशिश की जा रही है, इसी तरह विश्व रत्न बाबा साहेब को सिर्फ दलितों का मसीहा बताकर उन्हें एक समाज तक समेटने की पुरजोर कोशिश की जाती है. मुझे डर है कि सांगवी के महान संघर्ष को सिर्फ आदिवासियों तक ही सीमित न कर दिया जाए, जबकि वह देश की बेटी है, मेरी नजर में उनका संघर्ष मलाला यूसुफजई से कम बिलकुल भी नहीं है, लेकिन भारत जैसे ब्राह्मणवादी-पितृसत्तात्मक देश में संघर्ष से पहले जाति आ जाती है. दोनों ही बेटियों ने शिक्षा पाने के लिए हजारों संघर्ष किए हैं.

अगर एम. सांगवी भारत में न जन्म लेकर यूरोप या अमेरिका में जन्म लेती तो वे देश-दुनिया की ब्रांड एंबेसडर होती. भले ही हमारे संघर्ष को ब्राह्मणवादी व्यवस्था खारिज करे लेकिन दुनिया देख रही है, इतिहास कभी माफ नहीं करता है. बाबा साहेब को भारत से ज्यादा विदेशों में पढ़ा जाता है, पूरी दुनिया उन्हें सिंबल ऑफ नॉलेज से पुकारती है, जहां-जहां मानवता का जिक्र होगा बाबा साहेब सबसे आगे खड़े मिलेंगे. इसी तरह जहां साहस और कुर्बानी की बात आएगी जननायक बिरसा मुंडा अपने तीर-कमान के साथ सबसे आगे खड़े मिलेंगे और बात जब अंतहीन संघर्ष की होगी एम सांगवी अपनी बायलोजी की किताबों के साथ खड़ी मिलेंगी.

मेरे दिमाग में हर वक्त यह चलता रहता है कि हमारे पूर्वज और महानायक अपनी जान की बाजी न लगाते तो शायद मेरी जैसी लाखों लड़कियां किसी मंदिर में देवदासी होती, ब्राह्मणवादियों के हाथों नोची जा रही होती. अगर नांगेली ने स्तन कर को समाप्त करने के लिए अपने स्तन न काटे होते तो हमारे शरीर पर भी आज हमारा अधिकार न होता.

अभी वंचितों की पहली और दूसरी पीढ़ी किसी तरह लड़ झगड़ कर सिस्टम में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है. अपमान के तमाम घूंट पीकर वे वहां बने हुए हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता थोड़ा आसान हो. हमारे सामने संघर्ष के अलावा कोई विकल्प नहीं है, हर हाल में हमें लड़कर अपने अधिकारों को लेना होगा. NEET क्लियर करने के बाद सांगवी का संघर्ष खत्म नहीं बल्कि शुरू हुआ है, अबतक वह अपने गांव में अपने लोगों के बीच थी. अब वह बाहर निकलकर इस सामंती दुनिया का सामना करेंगी, मुझे उम्मीद है कि लाख कोशिशों के बावजूद वह टूटेगी नहीं, जननायक बिरसा मुंडा और विश्व रत्न बाबा साहेब से प्रेरणा जरूर लेगी. आज दुनिया की महान विद्रोहिणी और वीरांगना फूलन देवी होती, त्याग की मिसाल माता नांगेली होती तो सांगवी को देखकर बहुत खुश होतीं.

अंत में दुनिया के तमाम शोषितों से बस इतना ही कहना चाहूंगी कि बाबा साहेब का यह कथन कभी न भूलना- शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो…

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ये मीना कोटवाल के निजी विचार हैं। यदि कोई साथी ये लेख किसी और प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित करना चाहे तो कर सकते हैं।

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