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Monday, August 8, 2022

बदलती राजनीतिक मर्यादाओं में दल-बदल कानून की प्रासंगिकता!

लेख: अलीशा हैदर नक़वी

महाराष्ट्र की राजनीति में अप्रत्याशित बदलाव हो रहे हैं. महा विकास अघाड़ी में सरकार का नेतृत्व कर रही शिवसेना अपने विधायकों की बगावत से बिखरती हुयी दिख रही है. बागियों के नेता एकनाथ शिंदे शिवसेना के कुल 56 विधायकों में से 50 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं. महाराष्ट्र की राजनीति के संक्रमण काल में जहां एक पार्टी पर पारिवारिक दावेदारी को चुनौती मिल रही है, वहीं तेजी से बदलते राजनीतिक मर्यादाओं के समक्ष दल-बदल कानून की प्रासंगिकता भी लोक-विमर्श में है. 

1960 के आखिरी दशक में हरियाणा की राजनीति में ‘आया राम गया राम’ से प्रचलित दल-बदल की राजनीतिक परंपरा ने बड़ी तेजी से राष्ट्रव्यापी राजनीति की मुख्यधारा में अपनी पहचान बना ली. इंदिरा गांधी के आक्रामक राजनीतिक तेवर ने इस नयी राजनीति को व्यापक मान्यता दी. 1967-71 के चार सालों से दौरान 142 सांसदों और विभिन्न राज्यों के 1969 विधायकों ने अपना राजनीतिक पाला बदला. इस दौरान देश भर में 32 सरकारें गिरीं. 1980 के दशक में दल-बदल के व्यवस्थित राजनीति के खिलाफ आम राजनीतिक सहमति बनने लगी. 400 सीटों वाली राजीव गांधी की सरकार ने 1985 में 52 वां संविधान संशोधन करके दल-बदल कानून पारित किया. इसी संशोधन ने पहली बार राजनीतिक दलों को संवैधानिक पहचान दी. 

दल- बदल के इस कानून को राजनितिक स्थिरता की ओर बड़ा कदम माना गया. इस कानून से राजनीतिक पार्टियों के उनके मैनिफेस्टो से प्रतिबद्धता स्थापित करने की भी बात कही गयी. कानून में स्वेच्छा से अपनी पार्टी से त्याग-पत्र देने, पार्टी के व्हिप के विरुद्ध जाकर मतदान करने आदि को अयोग्यता का आधार बनाया गया. शुरू में क़ानून में एक तिहाई सदस्यों के साथ पार्टी में फूट को दल-बदल नहीं माना गया. थोक में दल बदल की अनुमति के इस प्रावधान को आलोचना का शिकार होना पड़ा. 2003 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने 91 संविधान संशोधन करके एक तिहाई के प्रावधान को हटाकर दो- तिहाई सदस्यों की सहमति से विलय की अवधारणा को जगह दिया.

व्यवहार में आने के साथ ही दल-बदल कानून की नियति में असफलता प्रलक्षित होने लगी. सबसे पहले ये छोटे-छोटे राज्यों में फेल हुआ, जहां राजनीतिक संख्याबल का खेल आसान था. आकड़ों के इस बाजीगरी में कई मौके ऐसे आये कि जिस स्पीकर के हाथों में इस कानून की तकदीर सौंपी गयी, उन्होंने खुद अपने मुख्यमंत्री बनने के लिए इस कानून का दुरूपयोग किया. दल – बदल कानून का मूल उद्देश्य राजनीतिक स्वार्थ पर नकेल कस जनसेवा को राजनीति की मौलिकता बनाना था. लेकिन इस कानून की आत्मा को रौंदकर बड़े संख्याबल के हेरफेर के लिए धन और बाहुबल राजनीति के सर्वमान्य प्रतीक बन गए. दल-बदल कानून जहां अपने राजनीतिक स्थिरता के साध्य को साधने में नाकाम रहा वहीं इसने जनप्रतिनिधियों के जनता के प्रति जवाबदेही को राजनीतिक पार्टियों के हवाले कर दिया. सदस्यों के असहमति को नामंजूर करते हुए इस कानून ने पार्टियों में सुप्रीमों कल्चर व्यापक मान्यता दिला दी. दल-बदल कानून में सदस्यों के अभिव्यक्ति की आजादी का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी उठा. 1993 के ‘कोहितो होलाहन केस’ में सुप्रीम कोर्ट ने दल-बदल कानून से अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा कम होने के दावे को खारिज कर दिया. हालांकि, इस मामले में कोर्ट ने में स्पीकर के फैसले के विरुद्ध न्यायिक पुर्निरीक्षण का रास्ता साफ कर दिया. 

दल- बदल कानून की विफलता में सबसे गंभीर सवाल स्पीकर की भूमिका पर है. दल-बदल कानून की सफलता स्पीकर की निष्पक्षता की मांग करता है. लेकिन किसी स्पीकर द्वारा लोकतांत्रिक शुचिता को पार्टी की वफादारी से ऊपर रखने का उदाहरण विरले ही मिलता है. स्पीकर की भूमिका को सुप्रीम कोर्ट से लेकर कई कमिटयों ने संदेह की नजर से देखा है. इसका ज्वलंत उदाहरण जनवरी 2020 में मणिपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है. इस मामले में कांग्रेस के बागी विधायक शयाम कुमार के मंत्री बनाये जाने को लेकर मणिपुर विधानसभा स्पीकर को 14 याचिकाएं दी गयी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पीकर की भूमिका पर गहरा संदेह जाहिर किया. कोर्ट ने स्पीकर के सत्ताधारी दल से होने को दल-बदल के मामलों में अनिवार्य निष्पक्षता के रास्ते का बाधा माना. साथ ही इस फैसले में स्पीकर की शक्ति को एक निष्पक्ष ट्रिब्युनल में निहित करने की जरुरत पर जोर दिया. ये मामला इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है की इसमें स्पीकर को सदस्यों की अयोग्यता पर तीन महीने के अंदर फैसला लेने की बात भी की गयी. लॉ कमीशन भी दल-बदल के मामलों में निर्णय को चुनाव आयोग की सलाह पर राज्यपाल और राष्ट्रपति में प्रतिष्ठित करने की सिफारिश कर चुका है. दल-बदल कानून के दुरूपयोग और कमजोरी को रेखांकित करते हुए 2002 में गठित संविधान पुर्निरीक्षण आयोग ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे. जस्टिस वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने दल-बदल करने वाले सदस्यों को पब्लिक ऑफिस से प्रतिबंधित करने और अविश्वास प्रस्ताव में इनके वोट को अवैध करने का प्रस्ताव रखा.

सुप्रीम कोर्ट के साहसिक फैसलों और तमाम कमिटियों के सुझावों के बावजूद दल-बदल कानून राजनीतिक अवसरवाद पर लगाम लगाने में बेअसर है. सरकारों के गिरने और पार्टियों के टूटने की घटना पर राजनीतिक नुकसान वाली पार्टियां राजनीतिक मर्यादा और लोकतांत्रिक परिपाटी की दुहाई तो देती हैं, लेकिन राजनीति में अवसरवाद को रोकने के लिए दल-बदल कानून को नयी संजीविनी देने की ज़रूरत पर पार्टियों में एक आम सहमति नहीं बन पा रही है. इसकी एक वजह यह है कि सब अपनी अपनी सत्ता के दौरान इस कानून की कमजोरी का फायदा उठा विरोधी दलों की ताकत में घुसपैठ करने को अपनी राजनीतिक उत्तरजीविता के लिए जरुरी समझते हैं.

दल- बदल कानून की अवधारणा उस राजनीतिक नैतिकता को स्थापित करना था जिसमें जनादेश की स्वाभाविक जीवन-प्रत्याशा की मजबूत संभावना हो. इस कानून को लोकतांत्रिक परंपराओं की मौलिकता के संरक्षण की तरह पेश किया गया. लेकिन अपने 37 सालों के सफर में यह कानून अपने लोकतांत्रिक लक्ष्यों से कोसों दूर है. ऐसे में सम-सामयिक राजनीति में इस कानून के औचित्य पर सवाल स्वभाविक है.

(लेखक- अलीशा हैदर नक़वी एक युवा पत्रकार हैं. झारखंड के जमशेदपुर की अलीशा आदिवासी, दलित, मुस्लिम और महिलाओं की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को मुख्यधारा के विमर्श में लाने के लिए प्रयासरत हैं.)

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