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Wednesday, November 30, 2022

राजस्थान: बाड़मेर जिले की पहली दलित महिला सब इंस्पेक्टर बनी लक्ष्मी गढ़वीर

सामाजिक, आर्थिक चुनौतियों से जूझते हुए लक्ष्मी ने यह मुकाम हासिल किया

जैसलमेर। राजस्थान में दलितों के साथ अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनमें उनका शोषण किया जाता है। इन घटनाओं के केंद्र में अधिकतर पश्चिमी राजस्थान ही होता है। ऐसी घटनाओं का मूल कारण यहां की जातीय व्यवस्था है। पश्चिमी राजस्थान की जातीय व्यवस्था इतनी बदतर है कि यहां दलित होना सामाजिक दायरे में एक अपराध की श्रेणी है। इसी बीच बाड़मेर की दलित महिला लक्ष्मी अपने जिले में पहली दलित थानेदार बनी है। पश्चिमी राजस्थान के इस द्वेष भरे माहौल में शिक्षा के जरिए खुद को साबित करना बेहद दुष्कर काम है जिस पर अगर महिला हो तो यह काम और अधिक मुश्किल हो जाता है। लेकिन यह भी सत्य है कि यहां की बेटियां रूढ़िवादी बेड़ियों को तोड़कर समाज की मुख्यधारा से लड़ाई करती हुई, जिजीविषा और संघर्ष के बलबूते खुद को साबित करती हैं।

बाड़मेर की पहली दलित महिला थानेदार

बाड़मेर जिले की लक्ष्मी गढ़वीर (मेघवाल) अपने जिले की पहली दलित महिला थानेदार बनी हैं। आजादी के अमृत महोत्सव मना रहे भारत में यह एक करिश्माई मोड़ है कि पहली दलित थानेदार बनने में बाड़मेर ने पचहत्तर बरस खपा दिए। बाड़मेर के गुड़ामालानी क्षेत्र के मंगले की ढाणी ग्राम पंचायत में एक छोटी सी मेघवाल बस्ती में रहने वाली लक्ष्मी गढ़वीर पहली दलित सब इंस्पेक्टर बन गई हैं। बेटी के सब इंस्पेक्टर बनने पर सबसे अधिक हैरानी उसकी मां धापू देवी को हुई। जब किसी रिश्तेदार ने उन्हें फोन पर लक्ष्मी के थानेदार बनने पर बधाई दी तो उसकी मां ने कहा, ‘छोरी ई थानेदार’ (लड़की भी थानेदार हो सकती है?)

दरअसल, पश्चिमी राजस्थान के गांव ढाणी में रहने वाला दलित समुदाय घोर जातिवाद के चंगुल में फंसा है। लक्ष्मी की मां जैसी अनेकों माएं है जिन्हे इस बात पर विश्वास ही नहीं होता कि कोई लड़की भी थानेदार बन सकती है। पासिंग परेड के बाद कंधों पर दो तारे लगाए लक्ष्मी जब घर पहुंची तो मां की खुशी सातवें आसमान पर थी।

पांच किलोमीटर पैदल जाती थी स्कूल

ऐसी कहानियां देखकर प्रतीत होता है सफलता संघर्षों के सिरहाने रखी जाती है। लक्ष्मी की यह यात्रा बाड़मेर की कई लड़कियों के लिए प्रेरणा भी है। लक्ष्मी ने पांचवीं तक की पढ़ाई अपने घर के पास छोटे से स्कूल से की। इसके बाद उसे पांच किलोमीटर दूर राजकीय माध्यमिक विद्यालय छोटू जाना पड़ा। जहां से उसने आगे की पढ़ाई की। लक्ष्मी विद्यालय पैदल ही जाती और घर आकर लालटेन की रोशनी में खुद के भविष्य को रोशन करने के सपने देखती। इसके साथ लक्ष्मी घर और खलिहानों का काम भी पूरी शिद्दत से करती। दसवीं पास करने बाद उसकी स्कूल छूट गई। सीनियर सैकेंडरी स्कूल नजदीक नहीं थी। दो बरस इसी कशमकश में निकल गए। फिर लक्ष्मी के भाई मुकेश ने उसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया और लक्ष्मी ने स्वयंपाठी विद्यार्थी के रूप में दाखिला लिया। बारहवीं पास करने के बाद लक्ष्मी कांस्टेबल बन गई।

Photo Credit- अमर उजाला
Photo Credit- अमर उजाला

कांस्टेबल से थानेदार तक का सफर

कांस्टेबल बनने के बाद लक्ष्मी ने सब इंस्पेक्टर पद को अपना लक्ष्य बनाया और खुद को पूरी तरह से झोंक दिया। पुलिस कांस्टेबल रहते हुए ही लक्ष्मी ने बीए और एमए किया। जिसके बाद उसने एसआई की परीक्षा पास की। पासिंग आउट परेड के बाद जब लक्ष्मी कंधों पर तारे जड़कर अपने घर आई तो पिता रायचंद और मां धापू देवी ने सैल्यूट देकर उसका स्वागत किया। लक्ष्मी ने अपनी पिक अप केप सम्मान स्वरूप माता पिता के सर पर रखकर अपनी सफलता उनके चरणों में रख दी।

बहनें मेहनत करें, सफलता जरूर मिलेगी

द मूकनायक से सब इंस्पेक्टर लक्ष्मी गढ़वीर ने कहा, “मेरे दो भाई हैं। मैं इकलौती बहन हूं। मेरे भाइयों ने मेरी पढ़ाई में पूरा सहयोग किया। माता-पिता ने हमेशा आशीर्वाद दिया। पढ़ाई करने वाली बहनों से कहना चाहती हूं कि वह मेहनत करती रहें, सफलता जरूर मिलेगी।”

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