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Sunday, August 7, 2022

राजस्थानः बाधा बन रही शिक्षक व कक्षा कक्षों की कमी, एक कमरे में लगती हैं दो क्लास!

विद्यालयों में खुले में पढ़ाई करते मिले विद्यार्थी, आधारभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं, द मूकनायक की ग्राउंड रिपोर्ट

बाड़मेर। राजस्थान के बाड़मेर जिले में शासन के निर्देश के बाद स्कूल खुल चुके हैं। पठन-पाठन का कार्य शुरू हो गया है। शिक्षकों ने कक्षाओं में देश के सुनहरे भविष्य को गढ़ना शुरू कर दिया हैं। इन सबके बीच स्कूलों में शिक्षक और कक्षा कक्षों की कमी पढ़ाई में बाधा बन रही है। हालांकि सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा व आधारभूत सुविधाएं देने के राज्य सरकार लाख दावे कर रही है। “द मूकनायक” ने इन दावों की पड़ताल की तो हकीकत कुछ और ही निकलकर सामने आई। पेश है रिपोर्टः-

खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ाई करते बच्चे.

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय भील रेबारी बस्ती खाखरलाई, सीवाना

यहां आज भी बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं। एक कक्षा कक्ष में अलग-अलग क्लास के बच्चों को बैठाया जा रहा है। इस स्कूल में 1 से 8वीं कक्षा तक के विद्यार्थी हैं, लेकिन क्लास रूम मात्र 4 हैं। अब ऐसे में कक्षा 1-2 के बच्चों को बाहर बैठाया और पढ़ाया जा रहा है। कक्षा 3-4, 5-6 व 7-8 के बच्चों को साथ बैठाकर पढ़ाई कराई जाती है। राजस्थान में 8वीं बोर्ड है ऐसी स्थिति में बच्चे कितना सीख पाएंगे, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को बैठाने के लिए 5 कक्ष है, जिन में से एक कमरा प्रधानाध्यापक कक्ष के रूप में काम में लिया जा रहा है। ऐसे में चार कक्षाओं के बच्चे खुले में बैठकर पढ़ने के लिए मजबूर हैं।


द मूकनायक को प्रधानाध्यापक बताते हैं कि वाइस कोड के अनुसार कमरे अलॉट होते हैं। धूप या बारिश का मौसम नहीं होता है तो हम बच्चों को बाहर बैठाकर पढ़ाई कराते हैं। मौसम सही नहीं होता है तो एक साथ दो क्लास कमरें में चलानी पड़ती हैं।

स्कूल के बरामदे में बैठकर मिड डे मील खाते बच्चे।

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय-2, छोटे गांव, खाखरलाई, सिवाना
यहां एक क्लास रूम में दो ब्लैक बोर्ड लगे हुए हैं, क्योंकि इस क्लास रूम में 2 अलग-अलग वर्ग के बच्चे बैठे हैं। एक शिक्षक अपने क्लास के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर अन्य कक्षा के बच्चे मस्ती कर रहे हैं। प्रधानाध्यापक मांगीलाल कहते है कि हमारे पास जो संसाधन है। उसमें हम बच्चों को ईमानदारी से पढ़ाई करवा रहे हैं। अब कमरे कम हैं तो एक साथ दो-दो क्लास के बच्चों को बैठाकर पढ़ाई करवाना पड़ता है। स्कूल के कमरों में बारिश होते छत ही टपकने लगती है। कमरे बनवाने को आलाधिकारियों को अगवत करा चुके हैं। मात्र चार शिक्षक एक दिन 8वीं तो एक दिन 9वीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालते हैं। शिक्षक पद खाली व बच्चों के बैठने के लिए बने कमरे अधूरे पड़े हैं। टांके निर्माण के लिए एसडीएम को पत्र लिखकर दिया गया था।

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय तरकों की ढाणी, नई खाखरलाई, सिवाना
बच्चों को पढ़ाने का शिक्षकों में जुनून और उनकी जिद के आगे संसाधनों की कमी हार जाती है। यहां के प्रधानाध्यापक चेलाराम का कहना है कि बच्चों का भविष्य संवारना उनकी प्राथमिकता है। बताते चलें कि इस विद्यालय में कक्षा एक से आठ तक पढ़ाई होती है। मात्र तीन शिक्षकों के भरोसे पूरा विद्यालय चलता है। इस विद्यालय में शिक्षक बच्चों को शिक्षकों की कमी महसूस नहीं होने देते हैं। आठवीं बोर्ड के लिए छुट्टी के बाद भी एक्स्ट्रा क्लास लेकर बोर्ड की तैयार करवाते हैं। द मूकनायक को छात्रा सीमा बताती है कि हमारे सर बहुत लग्न व मेहनत से पढ़ाते हैं। कोई सवाल समझ नहीं आता तो दोबारा समझाते हैं। हम खुशनसीब है कि हमें ऐसे शिक्षक मिले है।

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय तरकों की ढाणी नई खाखरलाई में गुणवत्तापरक शिक्षा हो या स्वच्छता या फिर हरियाली, मध्याह्न भोजन योजना, खेलकूद व सांस्कृतिक गतिविधियां, हर मामले में यह विद्यालय निजी विद्यालयों से काफी आगे है। पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के बावजूद अनुशासन इस विद्यालय के छात्र-छात्राओं व शिक्षकों की दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। जिससे वह अन्य विद्यालयों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। विद्यालय के शिक्षक ताराराम बताते हैं कि अगर विधार्थी स्कूल नहीं आते हैं। हम उनके अभिभावकों को कॉल कर शिक्षा के महत्व को समझाते हुए बच्चों को विद्यालय भेजने की सलाह देते हैं। विद्यालय के प्रधानाध्यापक चेलाराम बताते है कि शिक्षकों की कमी व बारिश की वजह से छत का निर्माण हमारे लिए आवश्यक है।

Azrudin
अजरूद्दीन स्वतंत्रत पत्रकार हैं. अजरूद्दीन ने जनतंत्र टिवी, जन टिवी राजस्थान, प्राइम न्यूज़ टीवी, मैगजीन प्रिन्ट मीडिया में काम कर चुके हैं. इन्हें पत्रकारिता क्षेत्र में 3 वर्ष हो चुके हैं. अजरूद्दीन ने शुरूआती पढ़ाई बाड़मेर जिले के सिवाना कस्बे से की है. इन्होंने हमेशा दलित, मुस्लिम, पिछड़ों के अधिकारों की आवाज उठाने का काम किया है.

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