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Friday, October 7, 2022

मध्यप्रदेश: मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी ने बढ़ाई किसानों की चिंता, जिंक सल्फेट के अभाव से कृषि उत्पादन में गिरावट

जानिए कैसे सुधारें मिट्टी की सेहत, द मूकनायक की इस खास रिपोर्ट में..

भोपाल। कृषि योग्य भूमि की मिट्टी में पोषक तत्वों की लगातार कमी होती जा रही है। हालांकि कृषि विभाग हर वर्ष समस्या के समाधान के लिए लगातार किसानों को खेतों पर खरपतवार नहीं जलाने, रासायनिक खाद के बजाय जैविक खाद का प्रयोग करने व बुवाई से पहले मृदा परीक्षण कराने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, लेकिन अभी वांछित सफलता नहीं मिली है। भोपाल स्थित राज्य मृदा परीक्षण प्रयोगशाला के अधिकारियों की माने तो रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग के बीच प्रदेश के विभिन्न भागों में किए गए उपजाऊ मिट्टी के परीक्षण में जिंक सल्फेट की मात्रा न्यूनतम पाई गई है।

जिंक सल्फेट पोषक की भारी कमी

भोपाल जिले की मृदा परीक्षण की जो रिपोर्ट आई हैं, उनमें जिले की अधिकांश कृषि भूमि में जिंक सल्फेट की मात्रा कम पाई गई है। बुंदेलखंड के इलाकों के जिलो में मृदा परीक्षण में भी जिंक सल्फेट की मात्रा काफी कम पाई गई है, जिसका प्रभाव फसल उत्पादन पर दिखाई देने लगा है।

इन 16 पोषक तत्वों का होना जरूरी

द मूकनायक से बातचीत करते हुए कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ कृषि बैज्ञानिक मनोज कुमार अहिरवार ने बताया कि मिट्टी में कुल 16 पोषक तत्व होते है, जो कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्सियम, मैग्नीशियम,सल्फर, जिंक, आयरन, कॉपर, बोरान, मैगनीज, मोलिबडनम, क्लोरीन व जिंक सल्फेट है। जो सभी प्रकार के पौधे और फसलों के जीवनचक्र के लिए जरुरी है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के ज्यादा मात्रा की जरूरत होती है। इसमें यदि किसी भी पोषक तत्व की कमी रह जाती है, तो फसल की पैदावार कम होगी।

जिंक सल्फेट की कमी से फसल पर पड़ता है यह प्रभाव

जिंक की कमी से पौधे की नीचे की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, लाल धब्बे भी हो जाते हैं, जिसके कारण पौधा सूर्य की किरणों से अपना पर्याप्त भोजन प्राप्त नहीं कर पाता है, जिसका असर उसके उत्पादन पर पड़ता है। क्योंकि, जिंक के कारण पत्तियां हरी रहती हैं, जो सूर्य की किरणों से क्लोरोफिन प्राप्त करने में सहायक होती हैं।

जिंक सल्फेट कम होने के यह है कारण

किसान फसल उत्पादन बेहतर प्राप्त करने के लिए बड़े स्तर पर रासायनिक खादों का प्रयोग कर रहा है, लेकिन जिंक सल्फेट नहीं डाल रहा है। क्योंकि ज्यादातर खादों में जिंक की मात्रा नहीं है, इसके लिए किसानों को अलग से इसका प्रयोग करना होता है, जो नहीं हो रहा है। सामान्यतः किसानों को 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक का प्रयोग करना चाहिए, किसान वह भी नहीं कर रहे हैं। जमीन में जिंक की तीन श्रेणियां मध्यम, न्यूनतम व अति न्यूनतम होती हैं।

किसान सिर्फ डीएपी और यूरिया ही खेतों में डालते हैं। जिससे मिट्टी में सिर्फ नाइट्रोजन और फास्फेट की ही कमी पूरी हो पाती है। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार किसान को अपने खेत की मिट्टी की जांच करानी चाहिए ताकि पोषकतत्वों की कमी को समय पर दूर किया जा सके।

151.91 हैक्टेयर में खेती

मध्यप्रदेश क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का दूसरा बड़ा राज्य है। इसका भौगोलिक क्षेत्रफल 307.56 लाख हैक्टेयर है, जो देश के कुल भूभाग का 9.38 प्रतिशत है। प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 307.56 लाख हैक्टेयर में से लगभग 151.91 लाख हैक्टर ही कृषि योग्य है। यहां सोयाबीन, चना, उड़द, तुअर, मसूर, अलसी के उत्पादन में प्रथम स्थान एवं मक्का, तिल, रामतिल, मूंग के उत्पादन में द्वितीय स्थान तथा गेहूं, ज्वार, जौ के उत्पादन में देश में तृतीय स्थान पर है। वहीं रबी में गेहूं, चना, मटर, मसूर, सरसों, गन्ना, अलसी बहुतायत से बोई जाती हैं।

Ankit Pachauri
Journalist, The Mooknayak

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