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Wednesday, November 30, 2022

गुना में जहाँ ज़मीन के लिए महिला को ज़िंदा जलाया गया, वहां सैकड़ों आदिवासियों की जमीनों पर है अवैध कब्ज़ा

मध्य प्रदेश के गुना की यह घटना आदिवासियों की ज़मीन पर किए गए कब्ज़े का ख़ाका पेश करती है। ज़मीन कब्ज़े की लोगों ने क्षेत्रीय अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई है, लेकिन न्याय नहीं मिला।

गुना/ म.प्र.। जुलाई के पहले हफ़्ते में मध्य प्रदेश (म. प्र.) के गुना से एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक 45 वर्षीय महिला को खेत में जलते हुए रिकॉर्ड किया गया था। एक हफ्ते बाद, 8 जुलाई को, भोपाल के हमीदिया अस्पताल में महिला ने दम तोड़ दिया।

घटना के तीन दिन बाद बाद पुलिस ने कुल 5 आरोपियों को गिऱफ्तार कर गुना ज़िला न्यायालय में पेश किया था। न्यूज़ रिपोर्ट्स के मुताबिक रामप्यारी को आग लगाने के दौरान आरोपियों ने उसका वीडियो भी बनाया।

LCW ने जब इस इलाके का दौरा किया तो पता चला की रामप्यारी बाई का एक अकेला मामला नहीं है. इस इलाके में सहरिया आदिवासियों की सैकड़ो एकड़ ज़मीन पर प्रभावशाली लोगों का कब्ज़ा है। इन ज़मीनों पर आदिवासियों के पट्टे तो हैं पर उन्हें जोतने का अधिकार नहीं है।

आदिवासियों ने अधिकारियों को, न्यायाधीशों को, यहाँ तक कि राज्यपाल और मुख़्यमंत्री को भी शिकायत पत्र लिखे, लेकिन न ही कोई कार्यवाही हुई और न ही कोई सुनवाई। प्रभावशाली लोगों का हौसला इतना मजबूत है कि तहसील स्तर के भू-अधिकारियों द्वारा सहरिया परिवारों की ज़मीन कई बार छुड़ाए जाने के बावजूद हर बार उन्होंने आदिवासियों को बेदखल कर दिया।

रामप्यारी और उसके पति ने इसी के विरूद्ध आवाज़ उठाने की कोशिश की, जिसका उन्होंने ख़ामियाज़ा चुकाया।

यह भी पढ़ें- मध्यप्रदेश: आदिवासी महिला पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर लगाई आग, 2 आरोपी गिरफ्तार

रामप्यारी को आग क्यों लगायी गयी?

यह घटना प्रदेश की राजधानी भोपाल से 200 किमी दूर स्थित धनोरिया गांव की है जो गुना ज़िले के बमोरी तहसील के अंतर्गत आता है। धनोरिया जंगल से घिरा एक गांव है, जहाँ पहुंचना आसान नहीं है। सड़कें कच्ची और अधिकतर घर मिट्टी के बने हैं।

इस गाँव की आबादी तक़रीबन 1,000 है, जिसमे से लगभग 50 फीसदी सहरिया समुदाय से हैं। रोज़गार का कोई पुख़्ता साधन न होने के कारण, गांववाले यहाँ कृषि पर आलंबित (निर्भर) हैं।

दरअसल, इसी गांव के अर्जुन सहरिया (मृत रामप्यारी के पति) को ठीक 22 वर्ष पहले, राज्य सरकार भूमि आवंटन की एक स्कीम के तहत, नायब तहसीलदार के आदेश पर 1.35 हेक्टेयर शासकीय ज़मीन का पट्टा मिला था।

यह स्कीम प्रदेश के भूमिहीन दलित और आदिवासी वर्ग को ज़मीन आवंटन की स्कीम थी। तहसीलदार के आदेश में धनोरिया और आस पास के ग्रामों के भूमिहीनों को 700 हेक्टेयर ज़मीन बाँटने का भी ज़िक्र है।

दो जुलाई को दर्ज पुलिस FIR (शिकायतकर्ता अर्जुन सहरिया) के अनुसार इस पट्टे पर धाकड़ जाति (OBC कैटेगरी) के प्रताप धाकड़, हनुमत धाकड़ और श्याम धाकड़ अपना कब्ज़ा जमाये थे।

तहसीलदार के आदेश की कॉपी [फोटो साभार- सतीश भारतीय]
तहसीलदार के आदेश की कॉपी [फोटो साभार- सतीश भारतीय]

FIR के मुताबिक आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता 1860 के धारा 307 (हत्या करने की कोशिश के लिए दण्ड) और 34 (जब एक अपराध सामान्य इरादे से किया हो) के तहत मुकदमा दर्ज़ किया गया। आरोपियों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के 3(2)(v) खंड के तहत भी केस दर्ज किया गया।

फिर वर्ष 2021 में तहसील प्रशासन ने अर्जुन को दो बार (16 और 28 जून) को ज़मीन वापस दिलाई। लेकिन आरोपियों ने कब्ज़ा फिर भी नहीं छोड़ा।

तब अर्जुन ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 250 के अंतर्गत आरोपियों से कब्ज़ा एक बार फिर छुड़वाया। यह धारा तहसीलदार को कब्ज़ा हटाने का अधिकार देती है। इसी धारा के तहत 8 मार्च 2022 को पुलिस की मदद से, प्रशासन ने उनकी ज़मीन संरक्षित तो करा दी, मग़र आरोपी फिर भी नहीं माने।

अर्जुन कहते हैं कि, “4 फरवरी, 2022 को आरोपियों ने मेरे साथ ज़मीन को लेकर मारपीट भी की थी।’’

ऐसे में जब 2 जुलाई को अर्जुन तक़रीबन दोपहर 2.30 बजे अपने खेत पहुंचे, तब उन्होंने पत्नी को जलता और आरोपियों को भागता पाया।

रामप्यारी, जो 80 प्रतिशत जल चुकी थीं, अस्पताल में अर्जुन को सिर्फ इतना बता पायी कि, “6 आरोपियों ने मुझ पर डीज़ल डालकर आग लगा दी।”

अर्जुन आगे बताते हैं कि म.प्र. पंचायत एवं ग्रामीण मंत्री महेन्द्र सिंह सिसोदिया ने 4 लाख रुपये मुआवज़े के तौर पर खाते में डलवाए हैं।

आदिवासियों की जमीऩ पर कब्ज़े को लेकर गुना (मध्य प्रदेश हाईकोर्ट) के वकील पुष्पराग शर्मा का विचार कुछ इस तरह है:

“मैं ऐसे बीसयों आदिवासियों को जानता हूँ जिन्होंने ज़मीन कब्ज़ा पर भू-राजस्व संहिता (धारा) 250 की कार्रवाई की और फैसला भी उनके पक्ष में गया। लेकिन अपने फैसले को तहसीलदार अप्लाई नहीं करवा पाए।”

सालों से किया जा रहा कब्ज़ा और दमन

वर्ष 2000 के शुरुआती सालों में दिग्विजय सिंह सरकार ने राज्य की चरनोई भूमि को कम कर – कुल राज्य भूमि का 7.5% से पहले 5% और फिर 2% घटाया – के अतिरिक्त ज़मीन को भूमिहीन अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) के परिवारों में वितरण किया। इसका ज़िक्र जनवरी 2002 में हुए भोपाल डिक्लेरेशन में भी हुआ।

इसका एक अनुमान एक्शन ऐड द्वारा प्रकाशित किताब ‘भोपाल घोषणा पत्र’ में डॉक्यूमेंट किया गया. किताब सरकारी आंकड़ों का ब्यौरा देते हुए बताती है कि लगभग 7 लाख एकड़ (2 लाख 83 हज़ार हेक्टेयर) भूमि, 3.44 लाख भूमिहीन SC/ST परिवारों को दी गयी।

उस दौरान दिए गए इन ज़मीन के पट्टों में सहरिया समुदाय भी शामिल था। लेकिन उसके बाद इन पट्टों पर कब्ज़ा भी प्रारम्भ हो गया।

जिसके बारे में धनोरिया के ही जगदीश सहरिया का आरोप है कि, “धनोरिया गांव में पूरे सहरिया समुदाय की मवेशियों को चराने वाली 365 बीघा (40.69 हेक्टेयर) और भू-दान (सरकारी ज़मीन का बंटन) के तहत मिली 16 लोगों की ज़मीन (पट्टे ) दबी हुयी हैं।”

अर्जुन आगे कहते है कि, “जब प्रभावशाली लोगों से हम ज़मीन मांगते हैं तो वह कहते है तुम्हें मार डालेगें। ऐसा वे इसलिए बोलते है क्योंकि उनके पास सहरियों के अपेक्षा अधिक जमीन और पैसे (का बल) है।”

देश में गुना आकांक्षी जिलों – सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े – की श्रेणी में से हैं। आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम प्रधान मंत्री ने जनवरी 2018 में शुरू किया, जिसका उद्देश्य 49 विकासात्मक संकेतों के आधार पर उनकी प्रगति का मूल्यांकन करना है।

फिर भी यहां की आदिवासी जनजातियों का विकास धीमा है। वह अपने अस्तित्व से जूझ रहे हैं और शोषण का भी शिकार हैं। जिसकी एक झलक बंधुआ मुक्ति मोर्चा, एक ग़ैर लाभकारी संघटन, के ज़िला संयोजक नरेन्द्र सिंह भदौरिया बताते हैं, “गुना ज़िला में सहरिया समुदाय की तादाद ज्यादा है। और बमोरी क्षेत्र (तहसील) में काफी ज़्यादा हैं… बमोरी में जितनी ज़मीन आदिवासियों के यहाँ हैं सरकार ने उनको पट्टे दिए हैं, लेकिन वह उनको जोत नहीं पा रहे हैं। जोतते हैं प्रभावशाली लोग।”

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जिला संयोजक नरेंद्र भदौरिया [फोटो साभार- सतीश भारतीय]
बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जिला संयोजक नरेंद्र भदौरिया [फोटो साभार- सतीश भारतीय]

भदौरिया के अनुसार इस क्षेत्र में अधिकांश ज़मीन बंधुआ मज़दूर बना कर छीनी जाती है।

देश व्यापी संघठन एकता परिषद (जो भूमि अधिकारों पर काम करती है) के गुना केंद्र का सर्वे बताता है कि आदिवासियों की ज़मीन का कब्ज़ा धनोरिया तक ही सीमित नहीं है।

एकता परिषद द्वारा 2018 से 2022 तक इकट्ठे किये गए दस्तावेज़ों के अध्ययन से पता चलता है कि बमौरी तहसील के 7 गांव (कुल 223 गांव में से) में लगभग 100 हेक्टेयर की ज़मीनों पर कब्ज़े की शिकायत है।

इन दस्तावेज़ों में एकता परिषद् और सहरिया ग्रामीणों द्वारा मध्य प्रदेश के राज्यपाल और ज़िलाधीश को लिखे गए शिकायत पत्र और नायब तहसीलदार का आदेश (भू-राजस्व संहिता, धारा 250) शामिल है।

विगत पांच सालों में, एकता परिषद् गुना के अनुसार प्रशासन को ज़मीन कब्ज़ा से सम्बंधित 25 ज्ञापन दिए गए हैं, पर ज़मीन कब्ज़ा का मसला हल नहीं हुआ।

राज्यपाल को लिखे इस पत्र में विवादित राजस्व भूमि की एक सूची (जो गांव वालों कि शिकायत और दस्तावेज़ देखकर तैयार की गयी) भी थी। इस सूची के मुताबिक, बमौरी तहसील के 10 गांव के 36 सहरिया लोगों की 53.189 हेक्टेयर जमींन और पनहेटी गांव के 9 भिलाला आदिवासी लोगों की 13.376 हेक्टेयर राजस्व भूमि का पट्टा तो है लेकिन उन पर कब्ज़ा है।

गुना ज़िलाधीश को 23 जुलाई 2021 को लिखे आवेदन में पन्हेटी गांव के 11 ग्रामीणों, जो अनुसुचित जनजाति से हैं, की 80 बीघा (8.91 हेक्टेयर) से ज्यादा ज़मीन कब्ज़े में है।

पत्र में वह लिखते हैं कि “कुछ दबंग और वन विभाग और राजस्व विभाग के ढीलपोल व मिलीभगत से हम ग़रीब अशिक्षित अनुसूचित जनजाति वर्ग के ग्रामीणों को हमेशा हमारी मालिकाना हक़ की भूमि व गांव से हम को खदेड़ने की कोशिश निरंतर की जा रही है।” पत्र के आखिर में यह ग्रामीण सुरक्षा की मांग भी रखते हैं।

ज़मीन कब्ज़ा के कागज़ात दिखाते एकता परिषद् के गुना संयोजक सूरज सहरिया [फोटो साभार- सतीश भारतीय]
ज़मीन कब्ज़ा के कागज़ात दिखाते एकता परिषद् के गुना संयोजक सूरज सहरिया [फोटो साभार- सतीश भारतीय]

वहीं एक और शिकायत पत्र है जो गुना ज़िलाधीश, गुना अनु-विभागीय अधिकारी और बमोरी तहसीलदार को (4 मार्च 2020) लिखा गया। इस आवेदन में पारोंदा, जोहरी और बमूरिया गांव के 9 सहरिया लोगों की 18.227 हेक्टेयर पट्टे की ज़मीन पर लोगों के कब्ज़े की शिकायत दर्ज है।

पत्र में शिकायतकर्ता कहते हैं कि, “ज़मीन के संबंध में हम लोगों ने कई बार पटवारी से कहा लेकिन पटवारी भ्रष्टाचार के बल पर प्रभावशाली लोगों का पक्ष ले रहा है और हमें कब्ज़ा वापस नहीं दिलवा रहा।”

LCW ने बाघरी और परांठ गांव के दो सहरिया आदिवासियों से भी बात की। उनका आरोप है कि उनकी 4.55 हेक्टेयर ज़मीन पर कब्ज़ा है।

इन्ही में से परांठ गांव के दो भाई, अमर (जो दोनों पैरों से अपाहिज है) और लक्ष्मण (जो आँखों से विकलांग हैं) सहरिया हैं. दोनों की कुल 4 हेक्टेयर ज़मीन पर कब्ज़ा है।

अमरसिंह द्वारा ज़मीन कब्ज़ा का सीएम के नाम कलेक्टर को सौंपा गया ज्ञापन  [फोटो साभार- सतीश भारतीय]
अमरसिंह द्वारा ज़मीन कब्ज़ा का सीएम के नाम कलेक्टर को सौंपा गया ज्ञापन [फोटो साभार- सतीश भारतीय]

अमर बताते हैं कि, ‘‘हमारी ज़मीन पर दशरथ किरार [जो की अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं] का कब्ज़ा है। जिसकी मैंने कलेक्टर से 6 बार शिकायत की। लेकिन सुनवाई नहीं हुई। जब दशरथ से हम ज़मीन मांगते हैं तब वह कहता है गड्ढा करके ज़मीन में गाढ़ देगें और कार्रवाई की तो जैसा धनोरिया में महिला को जलाया गया, वैसा तुम्हें जला देगे। मैं अपाहिज हूं कब तक मांग कर खाउंगा।’’

सहरिया और अन्य आदिवासी समुदाय की ज़मीन पर हो रहे कब्ज़े को लेकर जब LCW ने एकता परिषद (भूमि अधिकारों पर कार्यरत संस्था) के राष्ट्रीय महासचिव रमेश शर्मा से बात की तब उन्होंने बताया कि, “सहरिया, आदिवासी पूरे मध्य प्रदेश में भूमिहीन हैं। जहाँ ज़मीन कानून के तहत उन्हें ज़मीन मिलती है, वहाँ वे संसाधन के रूप में संपन्न नहीं है। इसलिये उनकी ज़मीनों को दबा दिया जाता है।”

शर्मा आगे कहते हैं कि. “आदिवासी संसाधनहीन है और सुरक्षा भी नहीं है। यह इसलिए है, क्योंकि वह समाज के सबसे निचले पायदान पर है।”

गुना में रामप्यारी को जलाये जाने और आदिवासी समुदाय की ज़मीनों पर धड़ल्ले से कब्ज़ा किए जाने को लेकर LCW ने ज़िला कलेक्टर फ्रैंक नोबल ए. से फोन पर बात की। लेकिन उन्होंने बात करने से इंकार कर दिया।

फिर जब इस मामले को गुना सब-डिविजनल ऑफिसर ऑफ़ पुलिस (SDOP) युवराज सिंह चौहान के सामने रखा तब उन्होंने बताया कि, “धनोरिया गांव की रामप्यारी सहरिया को जलाने के मामले में 6 आरोपियों को गिऱफ्तार किया गया है। पीड़ित पक्ष ने CID जांच की मांग की है। यदि ऊपर से आदेश आता है तब जांच की जायेगी।”

ज़मीन कब्ज़ा के संबंध में चौहान का कहना है कि, “इस क्षेत्र में ज़मीन कब्ज़ा संबंधित केस बहुत आते हैं। जब हमें आदेश मिलता हैं, तब हम कार्यवाही करते हैं।”

Satish Bhartiya
सतीश भारतीय लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच, जो भारत में भूमि संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधन का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं का एक स्वतंत्र नेटवर्क है, में इंटर्न हैं.

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