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Friday, October 7, 2022

मध्य प्रदेश: सरकार ने करोड़ों खर्च किए फिर 29 साल से क्यों नहीं दिखी सोन चिरैया!

वन मंत्री की विधानसभा में पेश रिपोर्ट में हुआ खुलासा

भोपाल। मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में करेरा स्थित सोन चिरैया अभयारण्य Son Chiraiya Sanctuary (करैरा अभयारण्य) पर सरकार ने ताला लगा दिया है। अभयारण्य में 29 साल पहले यानी, वर्ष 1993 के बाद सोनचिरैया (Sonchiraiya) नहीं देखी गई, लेकिन उसके नाम पर सरकार खर्च बराबर करती रही। जानकारी के अनुसार पिछले पांच साल में ही अभयारण्य में सवा करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं।

दरअसल, विधानसभा में वन मंत्री विजय शाह की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। जानकारी में बताया गया कि अन्य पशु-पक्षियों के संरक्षण और संवर्धन पर यह राशि खर्च हुई है। हालांकि रिपोर्ट सामने आने के बाद यह साफ हुआ है कि सोन चिरैया अभयारण्य (Son Chiraiya Sanctuary) के खर्चे सिर्फ कागजों में ही चल रहे थे।

प्रति वर्ष खर्च किए 26 लाख

जानकारी के अनुसार अभयारण्य में सोन चिरैया नहीं होने के बावजूद यहाँ खर्चा किया जा रहा था। वर्ष 2017-18 से अब 2021-22 तक कुल 1 करोड़ 29 लाख रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। यानी, हर साल औसतन 26 लाख रुपए अभयारण्य पर खर्च किए गए। सबसे ज्यादा वर्ष 2021-22 में 31.58 लाख रुपए खर्च किए गए।

सोन चिरैया अभयारण्य को खत्म करने की सरकार ने दी मंजूरी

राष्ट्रीय वन्यप्राणी बोर्ड से डिनोटिफिकेशन की अनुशंसा मिल चुकी है। सरकार ने भी इसे खत्म करने की मंजूरी दे दी है। द मूकनायक ने करेरा के स्थानीय पत्रकार दुर्ग सिंह से बात की उनके अनुसार सरकार के इस फैसले से 32 गांव के लोग खुश हैं, क्योंकि अभयारण्य के कारण किसानों का जमीन पर मालिकाना हक नहीं था। इस कारण दूसरे गांव के लोग यहां बेटी नहीं ब्याहते थे। अब ग्रामीण इस बात से खुश हैं कि उन्हें जमीन का मालिकाना हक मिल रहा है। बेटों की शादियां भी हो जाएंगी।

सिंह ने दावा किया कि, सोन चिरैया अभयारण्य में 1972 से ही सोन चिरैया नहीं थी। कुछ वर्षों पहले तक हिरण थे पर अवैध शिकार और खनन के चलते वह भी खत्म हो गए। हालांकि प्रवासी पक्षियों की आवाजाही यहाँ आज भी बनी रहती है, लेकिन सवाल यह है कि जब सोन चिरैया नहीं थीं तो इस पर सरकार ने करोड़ों रुपए क्यों खर्च किए। इस मामले में द मूकनायक शिवपुरी के डीएफओ मीना मिश्रा से फोन पर बात करने की कोशिश की पर उनसे संपर्क नहीं हो सका।

इस मामले में द मूकनायक से बातचीत करते हुए पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी पांडेय ने बताया, “पक्षी बड़े ही संवेदनशील होते हैं। जंगल में पेड़ पौधे घास की कमी होने के कारण ये उस स्थान को छोड़ देते हैं।” पर्यावरणविद के अनुसार, ऐसे पक्षी खराब वायु और पानी की गुणवत्ता की पूर्व में ही पहचान कर भी पलायन कर जाते हैं।

विधानसभा में सवाल से हुआ खुलासा

शिवपुरी जिले की करैरा विधानसभा से कांग्रेस विधायक प्रागीलाल जाटव ने अभयारण्य क्षेत्र में अवैध रेत, पत्थर उत्खनन की शिकायत भी की थी। द मूकनायक ने क्षेत्रीय विधायक से बात की, उन्होंने बताया कि हमने तीन बिंदुओं पर विधानसभा में सवाल पूछा था। जिसके बाद वन मंत्री विजय शाह ने जवाब में कहा कि वर्ष 1993 के बाद सोनचिरैया दिखाई नहीं दी, लेकिन अभयारण्य क्षेत्र में अन्य वन्य पशु-पक्षी मौजूद रहे हैं। पांच साल में अभयारण्य में राशि खर्च की गई इसका भी ब्यौरा दिया गया। विधायक ने खर्च की गई राशि पर सवाल उठाते हुए इसे जांच का विषय बताया है।

सोनचिरैया अभयारण्य में घाटीगांव के 512 वर्ग किमी क्षेत्र में से 111.73 वर्ग किमी और करैरा के 202.12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की जमीन शामिल थी। यहां आखिरी बार 1993 में सोनचिरैया देखी गई थी। इसके बाद से नरवर समेत करैरा तहसील क्षेत्र के लोग अभयारण्य को खत्म करने की मांग उठाने लगे थे। इसके लिए 32 गांव के लोग लगातार प्रदर्शन कर रहे थे। करैरा में अभयारण्य 202.21 वर्ग फीट में फैला है। किसानों की निजी जमीन पर खरीद-बिक्री पर रोक लगाई गई थी। किसान रजिस्ट्री तक नहीं करा सकते थे। ये किसान 40 साल से परेशान थे। मंत्री शाह ने विधानसभा में दी जानकारी में बताया कि डिनोटिफिकेशन के बाद कृषि भूमि का क्रय-विक्रय अब हो सकेगा।

सोन चिरैया आखिर क्यों विलुप्त हुई यह दुर्लभ प्रजाति

सोन चिरैया को ’द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’, ’बस्टर्ड’ और ’गोडावण’ भी कहते हैं कि इसका वैज्ञानिक नाम Ardeotis Nigriceps इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट के मुताबिक, इस पक्षी की संख्या साल 1969 में 1260 थी और यह देश के कई इलाकों में पाई जाती थी। लेकिन, वर्तमान में यह सिर्फ 5 राज्यों में पाई जाती है और इसकी संख्या सिर्फ 150 बची है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि सोन चिरैया बिजली की तार का शिकार हो रही हैं।

सीधे नही देख पाती सोन चिरैया

विश्व में पाई जाने वाले सबसे बड़े और वजनी उड़ने वाले पक्षियों की प्रजाति में से एक है सोन चिरैया। इसकी लंबाई 1 मीटर ऊंची और इसका वजन 10-15 किग्रा होता है। आकार में बड़े होने और शरीर का ढंग क्षैतिज होने और पैर लंबे होने के बावजूद ये उड़ तो सकती है, लेकिन उस फूर्ति के साथ नहीं। बिजली की तार के सामने आने पर ये बाकी पक्षियों की तरह बच नहीं पाते और इसका शिकार हो जाती हैं। दूसरी सबसे बड़ी वजह है कि इनमें सीधे देखने की क्षमता की कमी होना।

यह शुतुर्मुग जैसी दिखती हैं। इसे ’शर्मिला पक्षी’ और ’सर्वाहारी पक्षी’ भी कहते हैं। यह गेहूं, ज्वार, बेर के फल, बाजरा तो खाती ही हैं, टिड्डे कीट भी खाती हैं। इतना ही नहीं सांप, छिपकली और बिच्छू भी खा लेती हैं। यह राजस्थान का राजकीय पक्षी भी है। ये जमीन पर ही अपना घोंसला बनाती हैं, जिसकी वजह से इसके अंडों को कुत्ते और दूसरे जानवरों से खतरा होता है। यह भी इसके विलुप्त होने का कारण है।

घास के मैदानों की कमी

देश में बिजली के तारों के अलावा घास के मैदानों में कमी की वजह से भी इनकी संख्या कम होती जा रही है। ये घास के मैदानों को ही अपना प्राकृतिक निवास समझती हैं, लेकिन सिंचाई व्यवस्था खराब हो रही है और घास के मैदान नष्ट हो रहे हैं, ऐसी स्थिति में इनके सामने भी संकट गहरा रहा है। एक समय ये पक्षी पंजाब, हरियाणा, यूपी, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में मिलते थे। अभी फिलहाल इनका दिखना ही दुर्लभ है।

Ankit Pachauri
Journalist, The Mooknayak

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