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Saturday, July 2, 2022

छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य जहां कोयला खनन के लिए काटे जायेंगे 2 लाख पेड़, विरोध में आदिवासी मोर्चे पर डटे

र्यावरण संरक्षण, जंगली जानवरों और सघन वन की सुरक्षा दृष्टि से हसदेव अरण्य में कोयला खदानों का लगातार विरोध हो रहा है. पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में शामिल इस क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के लिए इस जंगल के बिना अपनी ज़िंदगी की कल्पना करना भी मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों के भारी विरोध के बाद भी हसदेव अरण्य क्षेत्र के परसा कॉल ब्लॉक के विस्तार को 6 अप्रैल 2022 को आधिकारिक रूप से मंजूरी दे दी. यहां जंगलों की कटाई कर कोयले की खदाने शुरू होंगी. ये प्रोजेक्ट एशिया के सबसे अमीर आदमी गौतम अड़ानी का है. इसको रोकने के लिए आदिवासियों ने चिपको आंदोलन भी शुरू किया लेकिन, पेडों की कटाई चोरी-छिपे रात में की जा रही है. ज़िसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं. लेकिन विडंबना ये कि पिछले कई दिनों से इस प्रोजेक्ट के खिलाफ चल रहे आदिवासियों के इस प्रदर्शन को नेशनल मीडिया में जगह तक नहीं मिली।

पिछले एक दशक से पर्यावरण संरक्षण, जंगली जानवरों और सघन वन की दृष्टि से देखते हुए हसदेव अरण्य में कोयला खदानों का लगातार विरोध हो रहा है. पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में शामिल इस क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के लिए इस जंगल के बिना अपनी ज़िंदगी की कल्पना करना भी मुश्किल है।

मौजूदा वक़्त में भारी संख्या में आदिवासी लोग इसका विरोध कर रहे हैं. खनन को मंजूरी मिलने के बाद से चिपको आंदोलन भी शुरू किया गया. लेकिन, जब ये लोग रात को अपने घर चले ज़ाते हैं उस दौरान चोरी-छिपे पेडों की कटाई की जा रही है।

जिस दौर में पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से जूझ रही है उस दौर में कॉर्पोरेट के मुनाफे के लिए इतने बड़े जंगली इलाके को तबाह किया जाना किसी भी प्रकार की समझदारी कैसे हो सकती है।

हसदेव अरण्य

बीते एक दशक से स्थानीय ग्राम सभाओं के संगठन हसदेव बचाओ संघर्ष समिति ने इस अमूल्य जंगल को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए. हर संबंधित विभाग को इससे परिचित कराया लेकिन कोई हल नहीं निकाला गया।

दरअसल ये कोल ब्लॉक्स राजस्थान राज्य विद्युत निगम को आबंटित हैं जिन्हें MDO के जरिये अडानी ग्रुप को खनन की ठेकेदारी सौंपी गयी है. इसलिए इसे अडानी के हित और मुनाफे से जोड़ कर देखा जा रहा है।

841 हेक्टेयर के हसदेव को खनन से बचाने के लिए बीते साल आदिवासियों ने सरगुजा से रायपुर तक 300 किलोमीटर पदय़ात्रा की। यहां तक दिल्ली जाकर राहुल गांधी से भी मुलाकात की लेकिन इस परियोजना को हरी झंड़ी दिखा दी गई।

हसदेव अरण्य

2010 में इसे ‘नो गो जोन’ घोषित किया गया था ज़िसका मतलब है कि ये इलाका पर्यवरण की दृष्टी से, जंगली जानवरों के लिए, आदिवासी और उनकी संस्कृती और मुख्य नदी हसदेव क इलाका है . जिसके बाद यहां कोयले के खनन पर रोक लगी थी. लेकिन 2012 में फिर खनन होने लगा. तबसे अब तक ये विवाद जारी है।

इससे पहले 2016 में राहुल गांधी ने स्वयं हसदेव अरण्य में जाकर स्थानीय आदिवासी समुदायों से ये वादा किया था कि अगर उनकी सरकार इस प्रदेश में बनती है तो वो इस जंगल को किसी भी कीमत पर उजड़ने नहीं देंगे. ये बात उन्होनें तत्कालीन सरकार का विरोध करते हुए संसद में भी कही थी कि भाजपा सरकार अडानी को एक बेशकीमती जंगल सौंप रही है. ज़िससे इलाके को बहुत बड़ा नुक़सान होगा. लेकिन सरकार बनने के बाद राहुल गांधी अपना वादा भूल गए और जो काम भाजपा कर रही थी वही काम अब भूपेश सरकार भी कर रही है. ज़िसे देखकर लगता है कि, राजनीति में मौका परस्ती सबसे बड़ी तो है ही लेकिन वायदे करके सरकार बनाना और सरकार बनते ही वायदे से मुकर जाना भी एक पैटर्न हो गया है।

Arun Kumar
Arun Kumar, Journalist The Mooknayak

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