58,000 मैला ढोने वालों में 97 फ़ीसदी दलित, ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं, कहां हैं…’

सविता आनंद
लेखिका एवं एक्टिविस्ट


देश में एक बार फिर मैला प्रथा चर्चा का विषय बनी जब संसद के शीतकालीन सत्र में राजद सांसद मनोज झा ने सामाजिक न्याय मंत्रालय से मैला ढोने की इस प्रथा पर जाति-आधारित संख्या का विवरण मांगा और इससे निजात पाने के उपायों का ब्योरा पूछा। 

सामाजिक न्याय मंत्रालय ने जवाब में बताया कि इस प्रथा से जुड़े लोगों में लगभग 97 प्रतिशत लोग दलित हैं। प्रतिबंधित होने के बावजूद भी (एमएस अधिनियम 2013) इस काम को लगभग 58,098 लोग आज भी अपनी आजीविका का हिस्सा बनाए हुए हैं। यह आंकड़े अपने आप में इसलिए भी चौकाने वाले हैं क्योंकि तकनीक और विज्ञान के विस्तार से जहां एक ओर हमें मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया मिला वहीं विडंबना यह भी है कि इस काम को लेकर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को कोई मुनाफा लगा नहीं, सो इसका औजार भी कभी बदला नहीं। 

हालांकि अब केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने जो आंकड़े पेश किए हैं उससे उलट इसी सरकार के मंत्री रामदास आठवले ने जुलाई 2021 में राज्यसभा में कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे और एल. हनुमंतैया द्वारा पिछले पांच वर्षों में मैला ढोने में लगे लोगों की संख्या के बारे में पूछे गए सवाल पर कहा था, कि “हाथ से मैला ढोने के कारण कोई मौत नहीं हुई है” पिछले पांच वर्षों में मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण कोई मौत नहीं हुई है, इस अवधि के दौरान कम से कम 472 लोग मानव मल की सफाई कर चुके हैं। यह जवाब सरकार के उदासीन रवैए और गंभीरता को दर्शाता है। जिस भाव की कल्पना मात्र ही अमानवीय और घृणित लगती हो वह दर्द पिछले कई दशकों से समाज के दलित वर्ग को झेलना पड़ रहा है, भारत स्वच्छ अभियान के चीखते, चिल्लाते, खोखले दावों के बीच।

मैला साफ़ करती महिला, केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने मैनुअल स्कैवेंजर के जो आँकड़ें पेश किए हैं उनमें 58098 में 43797 दलित हैं.

मंत्रालय ने बताया कि मैनुअल स्कैवेंजर की पहचान करने के लिए अधिनयम के प्रावधानों के तहत ही सर्वेक्षण कराए गए हैं, हालांकि कानून के अनुसार इस प्रथा से जुड़े लोगों की पहचान के लिए जाति के संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं होगा।  मैनुअल स्कैवेंजर के रूप में जिन 58,098 व्यक्तियों की पहचान हुई, उनमें से 43,797 व्यक्तियों के जाति से संबंधित आंकड़े ही उपलब्ध हैं। सर्वे के मुताबिक इनमें से करीब 97 प्रतिशत से भी ज्यादा यानी 42,594 मैनुअल स्कैवेंजर अनुसूचित जातियों से है, जो कि काफी चौकाने वाला है। जवाब में यह भी सामने आया कि लगभग 421 अनुसूचित जनजातियों से, करीब 431 अन्य पिछड़ा वर्ग से और बाकी 351 अन्य वर्गों से संबंधित हैं। 

अमूमन जब कोई नया सर्वे या इस तरह के सवाल सामने आते हैं तो यह विषय चर्चा में आ जाता है लेकिन इससे निजात पाने के लिए सरकारों के पास न तो कोई ठोस उपाय है, न कोई सोच और न ही दृढ़ मंशा है। आंकड़ों को छोड़ भी दें तो भी यह सच्चाई सर्व विदित है कि मैला प्रथा यानी मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े लोग सिर्फ़ एक ही जाति और समुदाय से आते हैं। 
एमएस अधिनियम 2013 के तहत इनके पुनर्वास के लिए प्रावधान होते हुए भी इस पर सरकारें कितनी गंभीर हैं यह किसी से छिपा नहीं है। प्रावधान के तहत एक परिवार में एक पहचानशुदा मैनुअल स्कैवेंजर को 40,000 रुपयों की एकबारगी नकद सहायता दी जाती है, जिसमें सरकार ने बताया कि अभी तक इस योजना के तहत सभी 58,098 व्यक्तियों को यह नकद राशि दे दी गई है। इसके तहत दो साल तक कौशल विकास प्रशिक्षण का भी प्रावधान है जिन्हें हर महीने सरकार 3,000 रुपयों का वजीफा भी देती है, जिसके तहत अब तक कुल 18,199 लोगों को वजीफा मिल चुका है। 

सामाजिक न्याय मंत्रालय ने इससे जुड़े स्वरोजगार कर्ज़ के बारे में भी बताया जिसके तहत पांच लाख रुपयों तक की पूंजीगत सब्सिडी देने का प्रावधान है जिसका लाभ अब तक कुल 1,562 लोग ले चुके हैं। बावजूद इसके कि इस व्यवस्था को जड़ से खत्म करने के लिए केंद्र व विभिन्न राज्य सरकारें कई वित्तपोषित योजनाऐं चलाती रही हैं, लेकिन यह सामाजिक नासूर यथावत जारी है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2007 में अपनी विवादित किताब ‘कर्मयोग’ में हाथ से मैला साफ करने को एक ‘आध्यात्मिक अनुभव’ माना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2007 में अपनी विवादित किताब ‘कर्मयोग’ में हाथ से मैला साफ करने को एक ‘आध्यात्मिक अनुभव’ माना है। पाँव से लेकर सिर तक जो इंसान मानव मल में डूबा हो वह आध्यात्मिक अनुभव कैसे हो सकता है, इस पर विमर्श की आवश्यकता है। 

वे आगे लिखते है, एक ज़माने मे किसी को ये संस्कार हुए होगे कि संपूर्ण समाज और देवता की साफ़-सफ़ाई की ज़िम्मेदारी मेरी है और उसी के लिए यह काम मुझे करना है। उसने सिर्फ़ पेट भरने के लिए यह काम स्वीकारा हो मैं यह नही मानता, क्योकि तब वह लंबे समय तक नही कर पाता। हालांकि विवादों के चलते इस किताब को बिकवाली से पहले ही हटा लिया गया था। मैला प्रथा की जड़ें हजारों साल से चली आ रही जाति और वर्ण व्यवस्था में ही निहित है, जो तबका कुछ ही रुपयों के लिए इस काम को करता आया है, हमारी व्यवस्थाओं ने यह मान लिया कि वह तबका इसी काम के लिए बना है और यह तबका भी इसे पीढ़ी दर पीढ़ी ढोते ही आया है। 

नारद संहिता और वाजसनेयी संहिता के अनुसार, दलितों के जिम्मे यह काम सौंपा गया है। इस के बाद बौद्ध व मौर्यकाल में भी यह परंपरा रही है, 1556 ईसवी में मुगलकाल में जहांगीर ने दिल्ली से लगभग 120 किलोमीटर दूर अलवर में 100 परिवारों के लिए एक सार्वजनिक शौचालय बनवाया था।लेकिन वहां मानव मैला का निबटारा कैसे किया जाता था, इस का विस्तृत ब्यौरा नहीं मिला है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वहां वाल्मीकि मैला ढोते थे. ब्रिटिश भारत के म्यूनिसिपल रिकॉर्ड के अनुसार भी मल का निबटारा वाल्मीकि या मेहतर द्वारा होता था।
यूं तो समय-समय पर तमाम महापुरुषों ने इसे खत्म करने की कवायद छेड़ी लेकिन सफलता न के बराबर मिली। इसे ख़त्म करने के साथ साथ वैकल्पिक रास्ते भी खोजे जाने की आवश्यकता थी, वह भी युद्धस्तर पर। 

सफाई कर्मचारी आंदोलन के मुताबिक देश में अभी भी 26 लाख ड्राई लैट्रीन हैं जिसकी साफ सफाई कोई न कोई व्यक्ति ही करता है।

हरिजन सेवक संघ द्वारा पहली बार इसे ख़त्म करने की मांग 1948 में उठाई गई थी। तब से लेकर अब तक, इस प्रथा को खत्म करने की जबानी कोशिशें बहुत हुई है। कानून बने, लेकिन सब धरे के धरे रह गए। यह प्रथा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। 

देश में लगातार सफाईकर्मियों की जान जोखिम में डालने और उनके लिए समुचितसुरक्षा के इंतज़ामों पर उठते सवालों के बीच इनके परिवार को मुआवजा देने की भी बात होती रही है, लेकिन अब तक कुल कितने सीवर सफाई कर्मचारियों ने काम के दौरान जान गंवाई। आंकड़ों की बात करें तो साल 2000 से अब तक कुल 1,760 सफाई कर्मचारियों की मौत हो चुकी है।  

सफाई कर्मचारी आंदोलन के मुताबिक देश में अभी भी 26 लाख ड्राई लैट्रीन हैं जिसकी साफ सफाई कोई न कोई व्यक्ति ही करता है। शुष्क शौचालयो की सफाई या सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को सरकार द्वारा संज्ञेय अपराध घोषित किये जाने के बावजूद भी सीवर/सेप्टिक टैंको मे दम घुटने से जान जाने का दौर आज भी जारी है। इसके उन्मूलन के लिए संसाधनो की कमी तो नही, लेकिन सरकारों की उदासीनता के चलते इस कलंक को हम आज भी ढो रहे हैं। क्या आपको लगता है स्वच्छ भारत अभियान का सपना मैला प्रथा उन्मूलन के बिना कभी पूरा हो सकेगा? 

लेखिका दिल्ली सरकार के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम की पूर्व निजी सचिव रही हैं. वर्तमान में भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां की विरासत को संरक्षित करने का काम कर रही हैं। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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